विषय 1: अमेरिका में H5N5 संक्रमण का मामला: एक दुर्लभ बर्ड फ्लू संक्रमण और इसका वैश्विक महत्व
समाचार संदर्भ
अमेरिका के Centers for Disease Control and Prevention (CDC) ने H5N5 एवियन इन्फ्लुएंजा (बर्ड फ्लू) के एक मानव संक्रमण की पुष्टि की है। यह वायरस बेहद दुर्लभ रूप से मनुष्यों को संक्रमित करता है। संक्रमित व्यक्ति को हल्के फ्लू जैसे लक्षण हुए और बाद में CDC की प्रयोगशाला में जांच के दौरान H5N5 की पुष्टि हुई। मरीज की स्थिति स्थिर है और मानव-से-मानव संक्रमण का कोई प्रमाण नहीं मिला है। इसका अर्थ है कि यह संक्रमण पक्षियों से मनुष्य में पहुंचने वाला एक अलग-थलग मामला है।
यह घटना ऐसे समय पर सामने आई है जब विश्वभर की स्वास्थ्य एजेंसियाँ कई एवियन इन्फ्लुएंजा प्रकारों की निगरानी कर रही हैं—जैसे मुर्गियों में H5N1 का प्रकोप, अमेरिका में डेयरी पशुओं में संक्रमण, और एशिया, यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में विभिन्न बर्ड-फ्लू वायरसों की बढ़ती पहचान।
H5N5 संक्रमण की पुष्टि किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति का संकेत नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस प्रकार के मानव संक्रमण बहुत ही दुर्लभ होते हैं। यह वायरस के विकास, पशु-से-मनुष्य संक्रमण और उभरती बीमारियों की निगरानी को समझने में मूल्यवान जानकारी प्रदान करता है।
व्याख्या
H5N5, अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ्लुएंजा (HPAI) का एक उपप्रकार है। सभी इन्फ्लुएंजा वायरस दो मुख्य प्रोटीनों से पहचाने जाते हैं—हेमाग्लुटिनिन (H) और न्यूरामिनिडेज़ (N)। H5 का अर्थ है हेमाग्लुटिनिन का पाँचवाँ प्रकार, और N5 का अर्थ है न्यूरामिनिडेज़ का पाँचवाँ प्रकार। इन दोनों के संयोजन से एक विशिष्ट वायरल उपप्रकार बनता है।
एवियन इन्फ्लुएंजा वायरस सामान्यतः जंगली जलपक्षियों, बतखों और मुर्गियों में पाए जाते हैं। मानव संक्रमण बहुत कम होते हैं और सामान्यतः संक्रमित पक्षियों या दूषित वातावरण से सीधे संपर्क के कारण होते हैं। अमेरिका के इस मामले में अभी संक्रमण का सटीक स्रोत पता लगाया जा रहा है, लेकिन प्रारंभिक जांच बताती है कि इसका संबंध पक्षियों या संक्रमित सतहों से हो सकता है।
हालाँकि H5N5 पक्षियों में अत्यधिक रोगजनक माना जाता है, मनुष्यों में इसके संक्रमण के प्रमाण बहुत ही सीमित हैं। यही कारण है कि यह मामला चिकित्सकीय रूप से हल्का लेकिन वैज्ञानिक रूप से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।
H5N5 वायरस को समझना
1. H5N5 की उत्पत्ति और विकास
- H5N5 एक प्राकृतिक प्रक्रिया जेनेटिक रीअसॉर्टमेंट से उत्पन्न हुआ, जिसमें दो इन्फ्लुएंजा वायरस एक ही मेजबान को संक्रमित करते हैं और उनके जीन मिश्रित होकर नया प्रकार बनाते हैं।
- यह वायरस एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के प्रवासी पक्षियों में पाया गया है, जिससे पता चलता है कि लंबी दूरी के पक्षी-प्रवास वैश्विक प्रसार में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
- H5N5 ने ऐतिहासिक रूप से पक्षियों में उच्च रोगजनकता दिखाई है, जिससे पोल्ट्री फार्मों में तेज़ संक्रमण और जंगली जलपक्षियों में मौतों की घटनाएँ देखी गई हैं।
2. H5N5, H5N1 से कैसे अलग है?
- H5N1 मनुष्यों में गंभीर संक्रमण और उच्च मृत्यु दर के लिए जाना जाता है, जबकि H5N5 के बहुत कम मानव मामले दर्ज हुए हैं और इसकी मनुष्यों को संक्रमित करने की क्षमता बहुत कम है।
- H5N5 अधिकतर जंगली जलपक्षियों में पाया जाता है, जबकि H5N1 व्यावसायिक पोल्ट्री फार्मों में अधिक फैलता है।
- प्रयोगशाला अध्ययनों से पता चला है कि H5N5 मानव श्वसन मार्ग के रिसेप्टरों से कम कुशलता से जुड़ता है, जिससे मानव संक्रमण की संभावना कम होती है।
3. वैश्विक प्रसार के मौजूदा पैटर्न
- हालिया निगरानी से पता चलता है कि मौसमी प्रवास के समय कई पक्षी प्रजातियों में H5N5 की पहचान बढ़ रही है।
- कई देशों में मृत पक्षियों में H5N5 मिला है, जिससे पता चलता है कि यह उच्च रोगजनक हो सकता है और निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता है।
4. यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
- मनुष्यों में H5N5 संक्रमण अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए एक भी मामला वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराता है।
- यह वायरस में ऐसे बदलावों का विश्लेषण करने में मदद करता है जो इसे स्तनधारियों में अधिक अनुकूल बना सकते हैं।
- ऐसे मामले सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियों को भविष्य के प्रकोपों की रोकथाम के लिए निगरानी तंत्र मजबूत करने में सहायता करते हैं।
मुख्य तथ्य (Key Facts)
- मनुष्यों में H5N5 संक्रमण अत्यधिक दुर्लभ है; यह मामला विश्व के कुछ दर्ज मामलों में से एक है।
- मरीज की स्थिति स्थिर है और गंभीर श्वसन जटिलताओं की कोई रिपोर्ट नहीं है।
- मानव-से-मानव संक्रमण का कोई प्रमाण नहीं है; संक्रमण का स्रोत पक्षियों से संपर्क माना जा रहा है।
- CDC वायरस का जीनोमिक अनुक्रमण कर रहा है ताकि इसके विकास, उत्पत्ति और किसी संभावित स्तनधारी-अनुकूलन का पता लगाया जा सके।
- यह मामला मजबूत नैदानिक निगरानी प्रणालियों के महत्व को दर्शाता है।
- विश्वभर में H5N1, H5N2, H7N9 और H5N5 जैसे कई उपप्रकारों की निगरानी की जा रही है।
- प्रवासी पक्षी H5N5 के प्राकृतिक भंडार माने जाते हैं।
- पका हुआ मांस और अंडे खाद्य सुरक्षा के लिए सुरक्षित हैं; इनके माध्यम से वायरस नहीं फैलता।
यह मामला क्यों मायने रखता है?
- यह दुर्लभ मानव संक्रमण वायरस के प्रजाति-बाधा पार करने के व्यवहार को समझने का अवसर देता है।
- यह वैज्ञानिकों को यह जानने में मदद करता है कि क्या वायरस में ऐसे बदलाव हो रहे हैं जो इसे स्तनधारियों में अधिक अनुकूल बना सकते हैं।
- यह घटना वैश्विक बर्ड फ्लू गतिविधि में वृद्धि के समय सामने आई है।
- इससे भविष्य के टीकों और एंटीवायरल रणनीतियों के लिए वास्तविक-जीवन डेटा मिलता है।
- यह पोल्ट्री किसानों, प्रयोगशाला कर्मियों और वन्यजीव कर्मचारियों के लिए सुरक्षा निर्देशों की आवश्यकता को और मजबूती देता है।
संक्रमण कैसे हुआ होगा?
- मरीज का संक्रमित पक्षियों या उनके वातावरण से संपर्क होने की संभावना सबसे अधिक है।
- संक्रमित सतहों, फार्मों, जलाशयों या पक्षियों के बैठने के स्थानों में संपर्क हो सकता है।
- पक्षियों की बीट, धूल या पंखों में मौजूद कणों के माध्यम से वायरस फैल सकता है।
देखे गए लक्षण
- मरीज में मौसमी फ्लू जैसे हल्के लक्षण—बुखार, खांसी, बदन दर्द—पाए गए।
- गंभीर श्वसन जटिलताएँ या निमोनिया नहीं पाया गया।
- शुरुआती जाँच और देखभाल से संक्रमण जल्दी पहचान में आ गया।
सरकारी ढांचा और प्रतिक्रिया
- CDC ने स्वास्थ्य कर्मियों को पक्षियों से जुड़े संदिग्ध या असामान्य फ्लू मामलों की निगरानी करने के निर्देश दिए हैं।
- पोल्ट्री फार्मों और वन्यजीव विभागों ने निगरानी बढ़ाई है।
- वायरस के जीनोम का अध्ययन जारी है ताकि उसके व्यवहार और विकास को समझा जा सके।
- सार्वजनिक जोखिम कम है और किसी प्रतिबंध या आपात कदम की आवश्यकता नहीं है।
वैज्ञानिक महत्व
- वैज्ञानिक वायरस में होने वाले उन जीन परिवर्तनों का अध्ययन कर सकते हैं जो इसकी संक्रमण क्षमता या गंभीरता को प्रभावित करते हैं।
- जीन डेटा वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों को जोखिम-मॉडल अपडेट करने में मदद करता है।
- यह मामला सार्वभौमिक फ्लू टीकों पर चल रहे अनुसंधान को मजबूत करता है।
- यह वैश्विक प्रारंभिक-चेतावनी प्रणाली को सुदृढ़ करता है।
निष्कर्ष
अमेरिका में पुष्टि हुआ H5N5 का यह मानव संक्रमण चिकित्सकीय रूप से हल्का लेकिन वैज्ञानिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह एवियन इन्फ्लुएंजा वायरसों की बदलती प्रकृति और कड़ी वैश्विक निगरानी की आवश्यकता को उजागर करता है। भले ही सार्वजनिक जोखिम कम है और मानव-से-मानव संक्रमण का कोई प्रमाण नहीं मिला है, फिर भी यह मामला बताता है कि बर्ड फ्लू वायरस तेजी से विकसित होते हैं और लगातार निगरानी तथा मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली अत्यंत आवश्यक है।
विषय 2: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम की मुख्य धाराओं को रद्द किया; सरकार को राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग स्थापित करने का निर्देश दिया
समाचार संदर्भ
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, 2021 की कई धारणाओं को असंवैधानिक और न्यायिक स्वतंत्रता के खिलाफ पाया। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग (NTC) स्थापित करने का निर्देश दिया, जो भारत के सभी केंद्रीय ट्रिब्यूनलों की नियुक्ति, सेवा शर्तें, कार्यकाल और वित्तीय स्वायत्तता को नियंत्रित करेगा। यह निर्णय हाल के वर्षों में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संबंधों पर लिए गए सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में गिना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्णय लिया?
मुख्य बिंदु
- कोर्ट ने कहा कि संक्षिप्त कार्यकाल, नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभुत्व और स्वतंत्रता की कमी न्यायिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांत का उल्लंघन है।
- कोर्ट ने चार साल की सीमा तय करने वाले नियम को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि यह न्यायिक निरंतरता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए बहुत कम है।
- कोर्ट ने उस प्रावधान को अमान्य किया, जिसके तहत सरकार को सदस्यों का चयन करने में सर्वोच्च शक्ति मिलती थी, भले ही सर्च-कम-सेलेक्शन समिति ने किसी नाम की सिफारिश की हो।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल “सरकारी विभागों का विस्तार” नहीं बन सकते और उन्हें स्वतंत्र न्यायिक निकाय के रूप में कार्य करना चाहिए।
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह एक राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग गठित करे, जो सभी केंद्रीय ट्रिब्यूनलों के प्रशासन, नियुक्ति और वित्तीय मामलों की निगरानी करेगा।
- कोर्ट ने जोर दिया कि न्यायिक आदेशों को बार-बार विधायिका द्वारा अधिलेखित करना “संवैधानिक संतुलन को कमजोर नहीं कर सकता।”
- यह निर्णय ट्रिब्यूनलों की भूमिका को मजबूत करता है, जो कराधान, पर्यावरण, कंपनी कानून और सेवा विवादों जैसे विशेष क्षेत्रों में उच्च न्यायालय के विकल्प के रूप में काम करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम के कुछ भाग क्यों रद्द किए?
अधिनियम में पाई गई समस्याएँ
- अधिनियम के तहत सरकार को ट्रिब्यूनल सदस्यों का चयन करने की अनुमति थी, भले ही चयन समिति ने किसी अन्य उम्मीदवार को उच्च रैंकिंग दी हो। कोर्ट ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता के खिलाफ पाया।
- चार साल का कार्यकाल निर्धारित करने से अस्थिरता पैदा हुई और योग्य न्यायिक अधिकारियों को शामिल होने से हतोत्साहित किया गया।
- अधिनियम ने कार्यपालिका को वेतन, भत्ते और अवसंरचना तय करने का अधिकार दिया, जिससे ट्रिब्यूनल की स्वायत्तता कमजोर हुई।
- यह कानून पहले से सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद पारित किया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सरकार न्यायिक निर्णयों को “विधायी रूप से अधिलेखित” करने का प्रयास कर रही थी।
- नियुक्ति प्रक्रियाओं पर कार्यपालिका का नियंत्रण हित संघर्ष पैदा करता था, खासकर जब ट्रिब्यूनल अक्सर सरकार के खिलाफ मामलों का निपटारा करते हैं।
- ट्रिब्यूनलों में योग्यता, कार्यकाल और सेवा शर्तों में असमानता एक असंगत न्यायिक ढांचा बनाती थी।
- अधिनियम ने न्यायपालिका-संचालित चयन समितियों की भूमिका को कमजोर कर दिया, क्योंकि उनकी सिफारिशें अनिवार्य नहीं थीं।
राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग (NTC) क्या है?
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
- NTC एक स्वतंत्र और स्थायी निकाय होगा, जो ट्रिब्यूनलों के प्रशासनिक और वित्तीय मामलों की देखरेख करेगा।
- यह आयोग ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति, स्थानांतरण और अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रबंधन करेगा।
- आयोग सभी ट्रिब्यूनलों में सेवा शर्तों, वेतन और कार्यकाल में समानता सुनिश्चित करेगा।
- यह आयोग सरकारी देरी के कारण खाली पदों की भराई में तेजी लाएगा, जो वर्तमान में महीनों या वर्षों तक विलंबित रहते हैं।
- NTC ट्रिब्यूनलों को कार्यपालिका हस्तक्षेप से बचाएगा और वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित करेगा।
- कोर्ट ने कहा कि ऐसे आयोग कई लोकतंत्रों में मौजूद हैं, जहाँ ट्रिब्यूनलों का शासन में महत्वपूर्ण योगदान होता है।
- राजनीतिक प्रभाव से ट्रिब्यूनलों को अलग करके, NTC त्वरित और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करेगा।
भारत में ट्रिब्यूनल क्यों महत्वपूर्ण हैं?
भूमिका और महत्व
- ट्रिब्यूनल कराधान, पर्यावरण, श्रम, सशस्त्र बल, कंपनी कानून और दूरसंचार विवादों जैसे क्षेत्रों में विशेष मामलों को संभालते हैं।
- यह न्यायपालिका के बोझ को कम करते हैं, क्योंकि तकनीकी रूप से जटिल विवादों को विशेषज्ञता के साथ निपटाते हैं।
- कई ट्रिब्यूनल उच्च न्यायालयों के विकल्प के रूप में कार्य करते हैं, इसलिए स्वतंत्रता आवश्यक है।
- ट्रिब्यूनल लंबी कानूनी प्रक्रियाओं की तुलना में तेज़ न्याय प्रदान करते हैं।
- ये वित्त, प्रतिस्पर्धा और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में नियमों के कुशल प्रवर्तन को सुनिश्चित करते हैं।
- इनके निर्णय प्रमुख आर्थिक और पर्यावरण नीतियों को प्रभावित करते हैं, इसलिए स्वतंत्रता आवश्यक है।
- एक सुचारू ट्रिब्यूनल प्रणाली निवेशक विश्वास, नियामक स्पष्टता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए आवश्यक है।
इस मामले में न्यायिक स्वतंत्रता क्यों केंद्रीय है?
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य चिंताएँ
- सरकार अक्सर ट्रिब्यूनलों में सबसे बड़ा पक्षकार होती है। यदि कार्यपालिका नियुक्तियों को नियंत्रित करती है, तो निष्पक्षता प्रभावित होती है।
- छोटा कार्यकाल सदस्यों को सरकार द्वारा पुनर्नियुक्ति पर निर्भर बनाता है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है।
- कार्यपालिका पर वित्तीय निर्भरता निर्णय लेने की स्वतंत्रता को खतरे में डालती है।
- ट्रिब्यूनलों में समान नियमावली की आवश्यकता है, क्योंकि असंगत नियम मनमानी शासन पैदा करते हैं।
- न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है, इसलिए सरकार इसे कानून द्वारा कमजोर नहीं कर सकती।
- उच्च न्यायालयों के विकल्प के रूप में कार्य करने वाले ट्रिब्यूनलों को संवैधानिक न्यायालयों जैसी स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी होती है।
- नियुक्तियों पर न्यायपालिका की निगरानी बनाए रखना आवश्यक है ताकि संतुलन और नियंत्रण बनाए रखा जा सके।
इस विषय पर पहले के सुप्रीम कोर्ट निर्णय
महत्वपूर्ण पिछली निर्णयें
- मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2010, 2014, 2020): कार्यपालिका-प्रभावित नियुक्तियों को बार-बार रद्द किया गया।
- रोज़र मैथ्यू (2019): बार-बार संशोधनों के माध्यम से ट्रिब्यूनल स्वतंत्रता कमजोर करने पर केंद्र की आलोचना।
- संघ बनाम आर. गांधी (2010): ट्रिब्यूनल को “विभागीय निकाय” नहीं बनने देने पर जोर।
- सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (2015): नियुक्तियों में कार्यपालिका नियंत्रण से बचने के सिद्धांत को मजबूत किया।
- एनसीएलटी और एनसीएलएटी मामला (2015): न्यायिक सदस्यों के लिए लंबा और सुरक्षित कार्यकाल आवश्यक।
- इन निर्णयों के बावजूद सरकार ने समान प्रावधान बार-बार पेश किए, जिसके कारण कोर्ट को पुनः हस्तक्षेप करना पड़ा।
निर्णय का प्रभाव
तत्काल और दीर्घकालिक परिणाम
- सरकार को अब नए नियम तैयार करने होंगे जो न्यायिक स्वतंत्रता के मानकों का पालन करें।
- कई ट्रिब्यूनलों में लंबित रिक्तियों को जल्दी भरा जा सकेगा।
- राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग की स्थापना प्रशासन को सुव्यवस्थित करेगी।
- पक्षकारों और वकीलों को तेज़ न्याय और कम बैकलॉग का लाभ मिलेगा।
- पर्यावरण, प्रतिस्पर्धा, वित्त और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में अधिक भरोसेमंद विवाद समाधान मिलेगा।
- यह निर्णय भविष्य में ट्रिब्यूनल स्वतंत्रता को कमजोर करने के प्रयासों को रोक देगा।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन मजबूत होगा।
महत्वपूर्ण तथ्य
- ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम लागू: 2021
- रद्द किया गया मुख्य मुद्दा: चार साल का कार्यकाल + कार्यपालिका प्रभुत्व
- मुख्य सिद्धांत: न्यायिक स्वतंत्रता (संवैधानिक मूल संरचना का हिस्सा)
- निर्देश: राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग की स्थापना
- उद्देश्य: स्वायत्तता, समानता और निष्पक्ष नियुक्तियां सुनिश्चित करना
- ट्रिब्यूनल अक्सर बदलते हैं: उच्च न्यायालयों के कार्य
- बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप: मद्रास बार एसोसिएशन ट्रिलॉजी + रोज़र मैथ्यू
- क्यों आवश्यक: कार्यपालिका अक्सर सबसे बड़ा पक्षकार होती है
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारत की ट्रिब्यूनल प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। कोर्ट ने उन प्रावधानों को रद्द किया जो न्यायिक स्वतंत्रता को खतरे में डालते थे और राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग बनाने का निर्देश दिया। इस निर्णय ने संवैधानिक सिद्धांतों को सुदृढ़ किया और विशेष मामलों में निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित किया। यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता, जैसे कि न्यायालयों की, कार्यपालिका के प्रभाव से समझौता नहीं की जा सकती। यह ruling भारत की ट्रिब्यूनल प्रणाली में अधिक पारदर्शिता, स्थिरता और दक्षता लाने की उम्मीद रखती है।
विषय 3: रूस ने लगभग 25 भारतीय मछली उत्पादन इकाइयों को निर्यात के लिए शीघ्र मंजूरी देने की संभावना जताई
समाचार संदर्भ
रूस जल्द ही लगभग 25 भारतीय मछली उत्पादन और समुद्री उत्पाद प्रसंस्करण इकाइयों को रूस के बाजार में निर्यात की अनुमति देने वाला है। यह निर्णय रूसी पशु चिकित्सा और फाइटोसैनिटरी अधिकारियों द्वारा भारत की मछली प्रसंस्करण सुविधाओं में स्वच्छता मानक, प्रसंस्करण गुणवत्ता और नियामक अनुपालन की जाँच के बाद लिया गया है। इस कदम से भारत और रूस के बीच मत्स्य क्षेत्र में बढ़ती व्यापारिक साझेदारी का संकेत मिलता है, जो वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर के मूल्य का है।
क्या हो रहा है?
मुख्य बिंदु
- रूस लगभग 25 भारतीय समुद्री भोजन और मछली प्रसंस्करण इकाइयों को मंजूरी दे रहा है, जिससे वे सीधे रूसी खरीदारों को निर्यात कर सकेंगे।
- फेडरल सर्विस फॉर वेटरनरी एंड फाइटोसैनिटरी सर्विलांस (Rosselkhoznadzor) की टीम ने विभिन्न तटीय राज्यों में इकाइयों का निरीक्षण किया।
- मंजूरी मिलने के बाद, भारतीय निर्यातकों को रूस के उच्च मांग वाले बाजार में झींगा, स्क्विड, सिप, और फ्रीज किए हुए मूल्यवर्धित उत्पादों की आपूर्ति का अवसर मिलेगा।
- यह कदम भारतीय समुद्री खाद्य निर्यात उद्योग के लिए महत्वपूर्ण प्रोत्साहन है, विशेष रूप से तब जब निर्यातक नए बाजारों की तलाश में हैं।
- भारत पहले से ही 120 से अधिक देशों में समुद्री उत्पाद निर्यात करता है, और रूस की स्वीकृति से भारत की यूरशियाई बाजार में स्थिति मजबूत होगी।
- इस विकास से पहले कई द्विपक्षीय चर्चाएं हुईं, जिनमें स्वास्थ्य प्रमाणपत्र और तकनीकी आवश्यकताओं को सरल बनाने पर ध्यान दिया गया।
- स्वीकृति मिलने के बाद, भारतीय निर्यातकों को रूस के बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा, जहाँ भू-राजनीतिक तनावों के कारण आपूर्ति में अंतर पैदा हुआ है।
रूस भारतीय इकाइयों को क्यों मान्यता दे रहा है?
निर्णय के पीछे कारण
- रूस भारत को भरोसेमंद और राजनीतिक रूप से स्थिर व्यापारिक साझेदार मानता है।
- भारतीय मछली प्रसंस्करण इकाइयों ने अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता और सुरक्षा मानक अपनाए हैं, जिससे निर्यात की तैयारी बेहतर हुई है।
- रूस को घरेलू मांग को पूरा करने के लिए विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं की आवश्यकता है, खासकर अन्य देशों पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद।
- भारत के वनामेई झींगा की उच्च गुणवत्ता और रूस में बढ़ती मांग ने निर्णय को प्रभावित किया।
- लागत प्रतिस्पर्धा भारतीय समुद्री उत्पादों को अन्य एशियाई निर्यातकों की तुलना में आकर्षक बनाती है।
- रूस उन देशों के साथ व्यापार बढ़ाना चाहता है जो वैश्विक तनावों के बावजूद लगातार आपूर्ति कर सकें।
- कृषि और खाद्य व्यापार में सहयोग बढ़ाना भारत–रूस आर्थिक भागीदारी का हिस्सा है।
रूसी निरीक्षकों ने क्या जाँचा?
निरीक्षण के पहलू
- निरीक्षकों ने प्रसंस्करण स्वच्छता का मूल्यांकन किया, जिसमें पानी की गुणवत्ता, तापमान नियंत्रण और सूक्ष्मजीव सुरक्षा शामिल है।
- HACCP (Hazard Analysis and Critical Control Point) अनुपालन की जांच की गई ताकि वैश्विक खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन हो।
- ठंडी श्रृंखला (Cold Chain) की संरचना की पुष्टि की गई, जिससे फ्रीज किए हुए उत्पाद निर्यात के दौरान सुरक्षित रहें।
- सुविधा डिजाइन, उपकरण रखरखाव, स्वच्छता प्रक्रिया और कर्मचारियों की सुरक्षा का गहन निरीक्षण किया गया।
इस निर्णय का महत्व
- रूस की स्वीकृति से भारतीय मछली उद्योग को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा।
- यह कदम निर्यात में विविधता लाने और नए बाजारों की खोज में मदद करता है।
- उद्योग को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप आधुनिकीकरण और स्वच्छता सुधार करने की प्रेरणा मिलेगी।
- दोनों देशों के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध मजबूत होंगे।
- यह निर्णय भारतीय मछली निर्यातकों की विश्वसनीयता और उत्पादों की गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित करता है।
मुख्य तथ्य
- रूस लगभग 25 भारतीय मछली प्रसंस्करण इकाइयों को स्वीकृति देने वाला है।
- स्वीकृति प्रक्रिया में स्वच्छता, प्रसंस्करण गुणवत्ता और HACCP अनुपालन पर ध्यान दिया गया।
- इससे भारत के समुद्री खाद्य निर्यात उद्योग को वैश्विक बाजार में नई संभावनाएँ मिलेंगी।
- स्वीकृति मिलने के बाद भारत-रूस मत्स्य व्यापार में वृद्धि होने की संभावना है।
- भारतीय उत्पाद जैसे झींगा, स्क्विड और फ्रीज किए हुए मूल्यवर्धित समुद्री उत्पाद रूस के उच्च मांग वाले बाजार में जाएंगे।
निष्कर्ष
रूस द्वारा भारतीय मछली उत्पादन इकाइयों को निर्यात की स्वीकृति देना भारतीय समुद्री खाद्य उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह कदम न केवल वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत करता है, बल्कि उद्योग को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार सुधार और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाने के लिए प्रेरित करता है। स्वीकृति मिलने के बाद, भारत और रूस के बीच मत्स्य क्षेत्र में व्यापारिक सहयोग बढ़ेगा और भारतीय उत्पादों की विश्वसनीयता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी।
विषय 4: COP30 में स्थानीय नेतृत्व की भूमिका: भारत के शहरी गरीब जलवायु कार्रवाई में अग्रणी
समाचार संदर्भ
जैसे ही विश्व COP30 के लिए तैयारी कर रहा है, एक स्पष्ट वैश्विक दृष्टिकोण उभरकर सामने आ रहा है: जलवायु कार्रवाई केवल अंतरराष्ट्रीय निकायों या राष्ट्रीय सरकारों द्वारा नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर से संचालित होनी चाहिए। भारत में यह परिवर्तन तेजी से दिखाई दे रहा है, जहाँ शहरी गरीब समुदाय जलवायु लचीलापन, सामुदायिक-आधारित अनुकूलन, अपशिष्ट प्रबंधन, जल संरक्षण और सतत शहरी नियोजन में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
भारत के निम्न-आय वाले शहरी समुदाय—विशेषकर अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग—अब जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बन गए हैं। वे गर्मी की लहरों, बाढ़, जल संकट, प्रदूषण और अवसंरचना की कमी जैसे मुद्दों का अनुभव प्रत्यक्ष रूप से करते हैं, जिससे उन्हें जलवायु संवेदनशीलता की अग्रिम पंक्ति में रखा गया है। COP30 का स्थानीय नेतृत्व और नीचे-से-ऊपर आधारित जलवायु शासन पर जोर भारत के "लोग-केंद्रित जलवायु कार्रवाई" दृष्टिकोण को और सुदृढ़ करता है।
व्याख्या
- शहरी गरीब समुदाय स्थानीय जलवायु अनुकूलन उपायों में सक्रिय हैं, जैसे कि वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट का पुनर्चक्रण, और कचरा प्रबंधन।
- सामुदायिक संगठनों के माध्यम से छोटे पैमाने की हरित परियोजनाएं लागू की जा रही हैं, जो प्रदूषण कम करने और जलवायु जोखिम घटाने में मदद करती हैं।
- ये समुदाय स्थानीय अनुभव और ज्ञान के आधार पर नीतियों और योजनाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं, जिससे सरकारी और निजी प्रयास अधिक प्रभावी बनते हैं।
महत्त्वपूर्ण तथ्य
- शहरी गरीब समुदायों का प्रत्यक्ष अनुभव उन्हें जलवायु अनुकूलन की वास्तविक चुनौतियों और अवसरों का मूल्यांकन करने में सक्षम बनाता है।
- स्थानीय नेतृत्व पर जोर देने से सतत शहरी विकास और लोगों-केंद्रित समाधान को बढ़ावा मिलता है।
- सामुदायिक प्रयासों के माध्यम से जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और ऊर्जा दक्षता में सुधार संभव होता है।
- COP30 में स्थानीय नेतृत्व को महत्व देना वैश्विक स्तर पर नीचे से ऊपर आधारित जलवायु शासन मॉडल को मान्यता देता है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
- यह दिखाता है कि जलवायु संकट के समाधान में केवल नीतिगत घोषणा या वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं है; स्थानीय स्तर पर सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
- यह शहरी गरीब समुदायों की सक्षमता और नवाचार को उजागर करता है, जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज किया जाता है।
- स्थानीय अनुभव से तैयार समाधान जलवायु जोखिम को कम करने और लचीलापन बढ़ाने में अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।
- COP30 में इस दृष्टिकोण को मान्यता मिलने से वैश्विक जलवायु रणनीतियों में स्थानीय समुदायों का महत्व और बढ़ेगा।
निष्कर्ष
भारत में शहरी गरीब समुदाय जलवायु कार्रवाई का एक प्रेरक उदाहरण पेश कर रहे हैं। COP30 की स्थानीय नेतृत्व पर जोर देने वाली नीतियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि नीचे-से-ऊपर आधारित जलवायु समाधान वैश्विक स्तर पर अधिक प्रभावी और स्थायी हों। ये समुदाय दिखाते हैं कि स्थानीय अनुभव, सामुदायिक भागीदारी और नवाचार मिलकर जलवायु संकट का सामना करने में सबसे महत्वपूर्ण साधन हैं।
विषय 5: भारत में डिजिटल शिक्षा और जलवायु संकट — शिक्षा और पर्यावरण के बीच सामंजस्य
समाचार संदर्भ
भारत में डिजिटल शिक्षा का विस्तार न केवल शैक्षिक प्रणाली को बदल रहा है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के जोखिमों से निपटने में भी मददगार साबित हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल माध्यमों के माध्यम से छात्र सतत विकास, जलवायु अनुकूलन, ऊर्जा संरक्षण और आपदा प्रबंधन जैसी महत्वपूर्ण विषयों को सीख रहे हैं।
देश की शहरी और ग्रामीण कम‑आय वर्ग की छात्र‑समुदायों ने डिजिटलीकरण को अपनाकर शैक्षणिक निरंतरता और जलवायु जागरूकता दोनों सुनिश्चित की हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) ने डिजिटल शिक्षा को प्राथमिकता दी है और इसका लक्ष्य है कि सभी विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीकी उपकरणों और ऑनलाइन संसाधनों तक समान पहुँच मिल सके।
व्याख्या
- डिजिटल शिक्षा प्लेटफॉर्म जैसे ऑनलाइन क्लास, वर्चुअल लैब, मोबाइल ऐप्स और ई‑लर्निंग पोर्टल्स ने छात्रों को क्लासरूम से बाहर आपदा‑प्रवण इलाकों में भी शिक्षा जारी रखने का अवसर दिया है।
- छात्र अब जलवायु परिवर्तन, सततता और ग्रीन टेक्नोलॉजी विषयों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। यह उन्हें भविष्य के करियर और समाजिक जिम्मेदारियों के लिए तैयार करता है।
- MOOCs (Massive Open Online Courses) और डिजिटल लाइब्रेरी छात्रों को विश्व स्तर के पाठ्यक्रम तक पहुँच देते हैं, जिससे ज्ञान का अंतर कम होता है।
- डिजिटल माध्यम से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा की पहुँच बढ़ी है, जो भौतिक स्कूलों की कमी के कारण पहले सीमित थी।
- छात्र अपनी स्थानीय समस्याओं, जैसे बाढ़, जल संकट, गर्मी की लहरें और प्रदूषण, के समाधान डिजिटल परियोजनाओं के माध्यम से सीख और लागू कर सकते हैं।
डिजिटल शिक्षा और जलवायु जागरूकता के पहलू
1. डिजिटल शिक्षा का प्रभाव
- डिजिटलीकरण से आपदा‑प्रवण इलाकों में भी शिक्षा को जारी रखा जा सकता है।
- रेडियो, टीवी, मोबाइल ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से छात्रों को आपदा‑प्रबंधन और जलवायु शिक्षा दी जा रही है।
- ऑनलाइन शिक्षा ने शिक्षकों और छात्रों को आपसी सहयोग के लिए एक मंच प्रदान किया है।
2. जलवायु शिक्षा में योगदान
- छात्र सतत विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के विषयों को सीख रहे हैं।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से छात्र अपने समुदायों में कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण और हरित परियोजनाओं को लागू कर रहे हैं।
- युवा पीढ़ी ग्रीन जॉब और हरित उद्यमिता के लिए तैयार हो रही है।
3. सरकारी पहल और नीती
- NEP 2020 ने डिजिटल शिक्षा को प्राथमिकता दी और सभी कक्षाओं में डिजिटल पहुँच सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा है।
- राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया (NDLI) जैसी पहलें लाखों मुफ्त शैक्षणिक संसाधन ऑनलाइन उपलब्ध करा रही हैं।
- सरकार ने डिजिटल शिक्षा उपकरणों, इंटरनेट सुविधा और शिक्षक प्रशिक्षण में निवेश बढ़ाया है।
महत्त्वपूर्ण तथ्य
- 2025 तक लगभग 70% छात्र ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म्स से जुड़ने की संभावना है।
- डिजिटलीकरण से आपदा‑प्रवण इलाकों में शिक्षा जारी रखने की क्षमता बढ़ी है।
- छात्र अब सततता और हरित तकनीक विषयों में कोर्स कर रहे हैं।
- NEP 2020 के अनुसार डिजिटल शिक्षा प्राथमिकता में है, लेकिन 36% स्कूलों में अभी भी इंटरनेट की कमी है।
- NDLI और MOOCs जैसे प्लेटफॉर्म छात्रों को विश्व स्तर के पाठ्यक्रम और ज्ञान उपलब्ध कराते हैं।
यह मामला क्यों मायने रखता है?
- डिजिटल शिक्षा और जलवायु शिक्षा का संयोजन छात्रों को समुदाय आधारित समाधान विकसित करने में मदद करता है।
- यह दृष्टिकोण नीचे-से-ऊपर (bottom-up) नेतृत्व को मजबूत करता है, जिससे स्थानीय स्तर पर जलवायु कार्रवाई अधिक प्रभावी होती है।
- सतत शिक्षा और जलवायु जागरूकता से छात्र हरित करियर और ग्रीन इकोनॉमी के अवसर तलाश सकते हैं।
- डिजिटल शिक्षा का निवेश दीर्घकालिक है क्योंकि यह भौतिक स्कूलों पर निर्भरता कम करता है और पर्यावरणीय दबाव घटाता है।
- यह मॉडल वैश्विक स्तर पर भी प्रासंगिक है क्योंकि शिक्षा आधारित जलवायु रणनीतियाँ अधिक समावेशी और प्रभावी होती हैं।
संक्रमण/प्रभाव और अपनाई गई रणनीतियाँ
- छात्र डिजिटल माध्यमों से अपने समुदाय में जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रतिक्रिया का अभ्यास कर रहे हैं।
- शिक्षक और स्कूल प्रशासन ऑनलाइन प्रशिक्षण और गाइडलाइन के माध्यम से छात्रों को प्रशिक्षित कर रहे हैं।
- स्थानीय सरकारी योजनाओं के साथ डिजिटल शिक्षा संयोजन से सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की दिशा में काम तेज हुआ है।
- छात्र अपने अनुभवों के आधार पर स्थानीय जलवायु परियोजनाओं में भाग ले रहे हैं, जैसे वृक्षारोपण, जल संरक्षण और स्मार्ट कचरा प्रबंधन।
वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व
- डिजिटल शिक्षा से छात्र जलवायु जोखिमों और सतत जीवनशैली के बारे में जागरूक हो रहे हैं।
- यह ज्ञान छात्रों को स्थानीय समस्याओं के समाधान और नीतिगत सुझाव देने में सक्षम बनाता है।
- डिजिटल और जलवायु शिक्षा का संयोजन समुदाय आधारित नेतृत्व और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देता है।
निष्कर्ष
भारत में डिजिटल शिक्षा और जलवायु जागरूकता का संयुक्त प्रयास शिक्षकों, छात्रों और समुदायों को सशक्त बना रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म न सिर्फ शिक्षा का माध्यम हैं, बल्कि जलवायु आपदा के समय शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित करने का तरीका भी हैं।
सततता‑उन्मुख पाठ्यक्रम और स्थानीय परियोजनाओं के माध्यम से छात्र भविष्य के लिए तैयार, जिम्मेदार और पर्यावरण-जागरूक नागरिक बन रहे हैं। डिजिटल शिक्षा और जलवायु कार्रवाई का यह सम्मिलन देश को शैक्षिक और पर्यावरणीय दोनों मोर्चों पर मजबूत बना रहा है।
सारांश
1. अमेरिका में H5N5 बर्ड फ्लू का मामला
अमेरिका में H5N5 एवियन इन्फ्लुएंजा के मानव संक्रमण की पुष्टि ने वैश्विक स्तर पर फ्लू के नए रूपों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। H5N5 एक अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ्लुएंजा उपप्रकार है, जो H5N1 और H5N6 जैसे सामान्य प्रकारों से आनुवंशिक रूप से अलग है। मानव संक्रमण बेहद दुर्लभ हैं, लेकिन इसका पता लगना दर्शाता है कि फ्लू वायरस जंगली पक्षियों में लगातार विकसित हो रहे हैं।
H5N5 की विशिष्टता इसका जीन पुनर्संयोजन (reassortment) करने की क्षमता है, जिससे यह अन्य इन्फ्लुएंजा वायरसों के साथ मिलकर नए, अप्रत्याशित प्रकार बना सकता है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि प्रारंभिक पहचान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि बर्ड फ्लू के प्रकोप सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोल्ट्री उद्योग जैसे आर्थिक क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिका के मामले में लक्षण हल्के थे, लेकिन स्वास्थ्य अधिकारी संक्रमण स्रोत की खोज, वायरस की विशेषताओं का अध्ययन और जीनोमिक निगरानी को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं।
यह घटना व्यापक वास्तविकता को उजागर करती है कि ज़ूनोटिक रोग एक निरंतर वैश्विक खतरा बने हुए हैं। मानव, पशुधन और वन्यजीव पारिस्थितिकी के बीच बढ़ती संपर्क संभावित संक्रमण की संभावना को बढ़ाती है। H5N5 मामला संकट नहीं है, लेकिन यह सतत निगरानी का संकेत देता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम की धाराओं को रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम की महत्वपूर्ण धाराओं को असंवैधानिक घोषित किया और कहा कि सरकार को ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों पर अत्यधिक नियंत्रण नहीं होना चाहिए। ट्रिब्यूनल का उद्देश्य उच्च न्यायालयों के कार्यभार को कम करना और तकनीकी मामलों जैसे कराधान, कॉर्पोरेट विवाद, पर्यावरणीय मुद्दे और प्रशासनिक अपीलों का विशेष निपटान सुनिश्चित करना था।
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन (NTC) की स्थापना का निर्देश दिया, जो ट्रिब्यूनलों की नियुक्ति, वित्त, अवसंरचना और प्रदर्शन मूल्यांकन की निगरानी करेगा। इसका उद्देश्य निष्पक्षता, स्थिरता और सार्वजनिक विश्वास सुनिश्चित करना है। यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रिब्यूनल न्याय व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं और उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित होना न्यायिक प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है।
सही तरीके से लागू होने पर NTC प्रशासन को आधुनिक बनाने, मामलों के निपटान की गति बढ़ाने और पारदर्शिता लाने में मदद करेगा। यह पेशेवर और जिम्मेदार संस्थागत व्यवस्था की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।
3. रूस द्वारा लगभग 25 भारतीय मत्स्य प्रसंस्करण इकाइयों को निर्यात के लिए अनुमोदन
भारत के समुद्री उत्पाद निर्यात क्षेत्र के लिए सकारात्मक विकास में रूस लगभग 25 भारतीय मत्स्य और प्रसंस्करण इकाइयों को निर्यात के लिए अनुमोदित करने वाला है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत वैश्विक मांग और भू-राजनीतिक बाधाओं के कारण खाद्य निर्यात में विविधीकरण की दिशा में काम कर रहा है।
अनुमोदन प्रक्रिया में सख्त निरीक्षण शामिल था, जैसे स्वच्छता, प्रसंस्करण मानक, भंडारण और ट्रैसिबिलिटी। यह भारत की विश्वसनीय निर्यातक के रूप में प्रतिष्ठा को मजबूत करता है। यह विकास सिर्फ व्यापार का अवसर नहीं, बल्कि लंबी अवधि के लिए क्षेत्रीय और संरचनात्मक लाभ का संकेत देता है। इससे कोस्टल समुदायों की आय स्थिर होगी और बेहतर प्रसंस्करण और कोल्ड-चेन नेटवर्क में निवेश बढ़ सकता है।
4. भारत के शहरी गरीब COP30 में जलवायु कार्रवाई में अग्रणी
COP30 के लिए तैयारियों के बीच यह स्पष्ट हो रहा है कि शहरी गरीब समुदाय जलवायु अनुकूलन और कम-कार्बन संक्रमण में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह दर्शाता है कि जलवायु कार्रवाई सिर्फ सरकारों या बड़ी कंपनियों के लिए नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर शुरू होने वाली पहल से भी प्रभावी होती है।
शहरी गरीब समूह कचरा प्रबंधन, छत बगिचा, जल संरक्षण और स्थानीय जल-निगरानी जैसी सामुदायिक पहल चला रहे हैं। सीमित संसाधनों के कारण ये समूह कम ऊर्जा उपयोग, अधिक पुनर्चक्रण और अनौपचारिक प्रतिरोधी प्रणालियाँ विकसित करते हैं, जो उन्हें तापमान वृद्धि, बाढ़ और प्रदूषण से बचाती हैं। COP30 ने इस बात पर जोर दिया कि स्थानीय नेतृत्व राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के साथ मिलकर काम करे।
सही समर्थन, प्रशिक्षण और नगरपालिका सहयोग मिलने पर, इनके नवाचार बड़े पैमाने पर लागू हो सकते हैं और व्यापक जलवायु समाधान में योगदान कर सकते हैं।
5. अत्यधिक निर्भरता: भारत का बाह्य व्यापार परिदृश्य
भारत के बाह्य व्यापार ढांचे की समीक्षा में सामने आया है कि यह कुछ प्रमुख बाज़ारों और वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भर है। निर्यात का बड़ा हिस्सा संयुक्त राज्य अमेरिका, यूएई, चीन और यूरोप जैसे प्रमुख गंतव्यों पर केंद्रित है, जबकि आयात, विशेषकर कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक उपकरण, अत्यधिक केंद्रीकृत हैं। यह स्थिति अर्थव्यवस्था को आपूर्ति व्यवधान, मुद्रा अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव के प्रति संवेदनशील बनाती है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को निर्यात उत्पाद और बाजार दोनों में विविधता बढ़ानी चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय तकनीकी घटक, विशेष रसायन, प्रसंस्कृत खाद्य और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्र इसमें योगदान कर सकते हैं। आयात के मामले में घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की असुरक्षा को कम किया जा सकता है।
स्ट्रक्चरल सुधार, मूल्य श्रृंखला एकीकरण, लॉजिस्टिक्स सुदृढ़ीकरण, बंदरगाहों का आधुनिकीकरण और व्यापार समझौते मजबूत करना आवश्यक है। उद्देश्य वैश्विक संबंध कटौती नहीं, बल्कि लचीला और संतुलित व्यापार नेटवर्क तैयार करना है।
बहुविकल्पीय प्रश्न
H5N5 बर्ड फ्लू का मामला – अमेरिका में
Q1. अमेरिका में हाल ही में H5N5 का पता लगना एक महत्वपूर्ण वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनी माना जा रहा है। इस संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सबसे बेहतर समझाता है कि H5N5 को कई पहले के एवियन इन्फ्लुएंजा उपप्रकारों की तुलना में अधिक चिंताजनक क्यों माना जाता है?
A) यह पहले ही कई देशों में मानव से मानव संक्रमण दिखा चुका है
B) जंगली पक्षियों, पोल्ट्री और स्तनधारियों के बीच इसका आनुवंशिक पुनर्संयोजन भविष्य में ऐसे स्ट्रेन के बनने की संभावना बढ़ाता है, जो मानव में प्रभावी रूप से फैल सके
C) H5N5 संक्रमण ने वैश्विक स्तर पर H5N1 संक्रमण को प्रतिस्थापित कर दिया है
D) WHO द्वारा H5N5 को "कैटेगरी-1 उच्चतम महामारी जोखिम" वाला वायरस घोषित किया गया है
उत्तर: B
व्याख्या: H5N5 में उच्च पुनर्संयोजन क्षमता है, यानी यह अन्य पशु इन्फ्लुएंजा स्ट्रेन के साथ मिश्रित होने पर अप्रत्याशित रूप से विकसित हो सकता है।
Q2. वैश्विक ज़ूनोटिक स्पिलोवर (जानवर से मानव संक्रमण) के पैटर्न को ध्यान में रखते हुए, निम्नलिखित में से कौन सा कारक भविष्य में H5N5 और समान स्ट्रेन के मानव में संक्रमण की संभावना सबसे अधिक बढ़ाता है?
A) अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों की संख्या में गिरावट
B) उच्च घनत्व वाली पोल्ट्री फार्मिंग का निर्माण उन वेटलैंड के पास, जहां प्रवासी पक्षी इकट्ठा होते हैं, और अनौपचारिक पशुधन बाजारों में कमजोर निगरानी
C) प्रवासी पक्षियों के शिकार पर वैश्विक प्रतिबंध
D) जमे हुए पोल्ट्री के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कमी
उत्तर: B
व्याख्या: पक्षियों और पोल्ट्री के निकट संपर्क और कमजोर निगरानी संक्रमण के जोखिम को बढ़ाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम की धाराओं को रद्द किया
Q3. भारत के ट्रिब्यूनल प्रणाली के संदर्भ में, नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन (NTC) बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मुख्य रूप से किस संवैधानिक चिंता को संबोधित करता है?
A) ट्रिब्यूनलों में उचित ICT उपकरणों की कमी
B) नियुक्तियों, कार्यकाल और सेवा शर्तों पर कार्यकारी नियंत्रण न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है
C) संसद ने पर्याप्त ट्रिब्यूनल नहीं बनाए
D) ट्रिब्यूनल पुराने वित्तीय नियमों का पालन करते थे
उत्तर: B
व्याख्या: ट्रिब्यूनल संचालन में कार्यकारी प्रभुत्व शक्ति पृथक्करण का उल्लंघन करता है।
Q4. नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन (NTC) की स्थापना से सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षित परिणाम क्या है?
A) ट्रिब्यूनल सिविल कोर्ट की पूरी प्रक्रियाओं का पालन करें
B) सभी अपीलों में उच्च न्यायालयों को बदलना
C) पारदर्शी नियुक्तियां, समान सेवा शर्तें और कार्यकारी दबाव से स्वतंत्रता प्रदान करना
D) ट्रिब्यूनल कार्य समय को कम करना
उत्तर: C
व्याख्या: NTC स्वतंत्र निगरानी के माध्यम से ट्रिब्यूनलों की स्वायत्तता और विश्वसनीयता को मजबूत करता है।
रूस द्वारा 25 भारतीय मत्स्य प्रसंस्करण इकाइयों को अनुमोदन
Q5. रूस द्वारा लगभग 25 भारतीय मत्स्य इकाइयों को सघन निरीक्षणों के बाद अनुमोदित करने की योजना निम्नलिखित में से क्या दर्शाती है?
A) यह पूरी तरह अनियंत्रित छोटे पैमाने के उत्पादन पर निर्भर है
B) यह वैश्विक खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और ट्रैसिबिलिटी मानकों को पूरा करता है, जिससे बाजार में विविधीकरण संभव होता है
C) यह केवल मीठे पानी की मछलियों का निर्यात कर सकता है
D) इसमें आधुनिक कोल्ड-चेन अवसंरचना की कमी है
उत्तर: B
व्याख्या: रूसी निरीक्षण पास करना भारत की अंतरराष्ट्रीय मानकों के पालन की सुधारित स्थिति को दर्शाता है।
Q6. यदि भारतीय मत्स्य निर्यात रूस में बढ़ता है, तो लंबी अवधि में मत्स्य क्षेत्र के लिए सबसे संभावित संरचनात्मक लाभ क्या है?
A) एक बाजार पर निर्भरता बढ़ना
B) प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों में निवेश में गिरावट
C) विविधीकरण और तटीय समुदायों के लिए स्थिर आय के कारण निर्यात जोखिम कम होना
D) मूल्य-युक्त समुद्री उत्पाद पर ध्यान कम होना
उत्तर: C
व्याख्या: नए बाजार से उत्पादकों की कीमत स्थिरता बढ़ती है और जोखिम कम होता है।
भारत के शहरी गरीब जलवायु कार्रवाई में अग्रणी
Q7. COP30 चर्चाओं के अनुसार, निम्नलिखित में से क्यों निम्न-आय वाले शहरी समुदाय जलवायु कार्रवाई में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं?
A) वे सबसे अधिक प्रति व्यक्ति उत्सर्जन करते हैं
B) उनकी संसाधन-कुशल जीवनशैली और अनुकूलन व्यवहार स्थायित्व के लिए स्केलेबल मॉडल प्रदान करते हैं
C) वे औपचारिक शहरी जलवायु संस्थानों का संचालन करते हैं
D) वे केवल राष्ट्रीय जलवायु कार्यक्रमों पर निर्भर हैं
उत्तर: B
व्याख्या: उनके कम-संसाधन नवाचार और सामुदायिक अनुकूलन अभ्यास दोहराने योग्य और प्रभावी हैं।
Q8. COP30 की "स्थानीय नेतृत्व" की अपील वैश्विक जलवायु शासन में किस प्रमुख संरचनात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है?
A) निर्णय-निर्माण को राष्ट्रीय सरकारों के अंतर्गत केंद्रीकृत करना
B) केंद्रीय एजेंसियों को नगरपालिका निकायों से बदलना
C) सामुदायिक-संचालित जलवायु क्रियाओं को राष्ट्रीय और वैश्विक नीति ढांचे में शामिल करना
D) अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से जलवायु वित्तीय सहायता समाप्त करना
उत्तर: C
व्याख्या: वैश्विक जलवायु नीति अब सामुदायिक-केंद्रित निर्णय लेने की दिशा में बढ़ रही है।
भारत के बाह्य व्यापार में अत्यधिक निर्भरता
Q9. भारत का बाह्य व्यापार परिदृश्य मुख्य रूप से किस कारण से संवेदनशील माना जाता है?
A) व्यापार साझेदारों का अत्यधिक विविधीकरण
B) कुछ निर्यात बाजारों और सीमित उत्पाद वर्ग पर अत्यधिक केंद्रित होना
C) उत्पादन क्षमता की अधिकता
D) व्यापार समझौतों में न्यूनतम उपस्थिति
उत्तर: B
व्याख्या: सीमित क्षेत्रों और बाजारों पर भारी निर्भरता बाहरी झटकों को बढ़ाती है।
Q10. भारत की दीर्घकालिक बाह्य व्यापार निर्भरता को कम करने के लिए सबसे प्रभावी रणनीति कौन सी है?
A) सभी आयात पर समान टैरिफ लगाना
B) निर्यात को पारंपरिक खरीदारों तक सीमित करना
C) महत्वपूर्ण और उच्च-मूल्य क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाना
D) क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में भागीदारी कम करना
उत्तर: C
व्याख्या: आवश्यक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता लचीलापन बढ़ाती है और संवेदनशीलता कम करती है।