बेहद प्रसिद्ध है गढ़वा का मां गढ़देवी मंदिर, जानें इसका इतिहास और महत्व
गढ़वा जिला मुख्यालय के बीच शहर में स्थित मां गढ़देवी मंदिर झारखंड ही नहीं बल्कि आसपास के राज्यों में भी अत्यंत प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के रूप में जाना जाता है। यह मंदिर लगभग 200 वर्ष पुराना माना जाता है और क्षेत्र के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां विराजमान शक्ति स्वरूपा मां गढ़देवी को गढ़वा ‘गढ़’ की देवी तथा आसपास की आबादी की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है, इसी कारण पूरे वर्ष दूर-दराज से भक्त दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते रहते हैं। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं में मन्नत मांगने वाले और मन्नत पूरी होने के बाद मां का आशीर्वाद लेने वाले दोनों प्रकार के भक्त शामिल होते हैं। वर्ष भर मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहता है, लेकिन विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है।
नवरात्र और श्रावण मास में उमड़ती है भक्तों की भीड़
मां गढ़देवी मंदिर में वर्ष के दोनों प्रमुख नवरात्र — चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र — के दौरान भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। शारदीय नवरात्र में सप्तमी से लेकर दशमी के विसर्जन तक प्रतिदिन लगभग 50 हजार से अधिक श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए मंदिर न्यास को भीड़ नियंत्रण के लिए प्रशासन की सहायता लेनी पड़ती है। नवरात्र के अलावा श्रावण मास में भी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है और बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूबा रहता है।
109 वर्ष पूर्व शुरू हुई थी दुर्गा पूजा की परंपरा
ऐतिहासिक गढ़देवी मंदिर में दुर्गा पूजा की शुरुआत लगभग 109 वर्ष पूर्व, यानी वर्ष 1914 में हुई थी। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, गढ़वा गढ़ के राजा बाबू अमर दयाल सिंह ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एक ब्राह्मण से परामर्श लिया था। ब्राह्मण ने बंगाली पद्धति से मां गढ़देवी मंदिर में दुर्गा पूजा आयोजित करने की सलाह दी थी, जिसके बाद वहां दुर्गा पूजा की परंपरा शुरू हुई थी और आज भी लगातार जारी है। दशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा को श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाते हैं। इस दौरान मां की प्रतिमा को कंधा देने के लिए भक्तों के बीच विशेष उत्साह और श्रद्धा देखने को मिलती है।
मंदिर न्यास का गठन और मंदिर का विस्तार
मंदिर के बेहतर संचालन और विकास के उद्देश्य से वर्ष 1990 में मंदिर न्यास का गठन किया गया था। तत्कालीन बिहार सरकार के मंत्री और वर्तमान विश्रामपुर विधायक रामचंद्र चंद्रवंशी के प्रयास से इस न्यास की स्थापना हुई थी। न्यास में अध्यक्ष के रूप में रामचंद्र चंद्रवंशी कार्यरत रहे, जबकि अंचल अधिकारी पदेन सचिव होते हैं। समाजसेवी विनोद जायसवाल की अध्यक्षता में मंदिर निर्माण समिति का गठन किया गया था, जिसकी देखरेख में मंदिर का लगातार विस्तार किया जाता है। वर्तमान में मंदिर का भव्य गुंबद लगभग 109 फीट ऊंचा है, जो इसकी स्थापत्य सुंदरता और धार्मिक महत्व को दर्शाता है। मंदिर की महिमा पर आधारित एक धार्मिक एलबम भी तैयार किया गया है, जिसमें मां गढ़देवी की महिमा का वर्णन किया गया है।
भैंसा बलि प्रथा को किया गया था बंद
पूर्व समय में नवरात्र की नवमी तिथि पर मंदिर में भैंसा बलि देने की परंपरा प्रचलित थी, जो कई दशकों तक जारी रही। मंदिर ट्रस्ट के गठन के बाद वर्ष 2000 में अध्यक्ष रामचंद्र चंद्रवंशी की पहल पर इस प्रथा को बंद कर दिया गया। हालांकि इस निर्णय का कुछ लोगों ने विरोध भी किया, लेकिन बाद में इसे सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। उसके बाद पारंपरिक रूप से बकरे की बलि की प्रथा जारी रहती है।
| क्रम संख्या | विषय | मंदिर से संबंधित तथ्य |
|---|---|---|
| 1 | मंदिर का नाम | मां गढ़देवी मंदिर |
| 2 | स्थान | गढ़वा जिला मुख्यालय, झारखंड |
| 3 | धार्मिक महत्व | क्षेत्र की प्रमुख शक्तिपीठ एवं आस्था का केंद्र |
| 4 | स्थापना काल | लगभग 200 वर्ष पुराना मंदिर |
| 5 | देवी स्वरूप | शक्ति स्वरूपा मां गढ़देवी |
| 6 | धार्मिक पहचान | गढ़वा ‘गढ़’ की देवी एवं स्थानीय लोगों की कुलदेवी |
| 7 | श्रद्धालुओं की मान्यता | सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूर्ण होने की आस्था |
| 8 | प्रमुख पर्व | चैत्र नवरात्र एवं शारदीय नवरात्र |
| 9 | नवरात्र विशेषता | सप्तमी से दशमी तक बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आगमन |
| 10 | श्रावण मास | विशेष पूजा-अर्चना एवं भक्तों की अधिक भीड़ |
| 11 | दुर्गा पूजा परंपरा | लगभग 1914 से दुर्गा पूजा आयोजित होती रही |
| 12 | विसर्जन परंपरा | दशमी के दिन प्रतिमा को कंधों पर ले जाकर विसर्जन |
| 13 | मंदिर विकास | समय के साथ मंदिर परिसर का विस्तार |
| 14 | स्थापत्य विशेषता | लगभग 109 फीट ऊंचा भव्य गुंबद |
| 15 | धार्मिक गतिविधियां | वर्ष भर पूजा, दर्शन एवं धार्मिक आयोजन |
| 16 | पूर्व परंपरा | नवरात्र नवमी पर भैंसा बलि प्रचलित थी |
| 17 | वर्तमान परंपरा | पारंपरिक रूप से बकरे की बलि जारी |
| 18 | सामाजिक महत्व | धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामुदायिक एकता का केंद्र |
| 19 | वातावरण | वर्ष भर भक्तिमय एवं धार्मिक माहौल |
| 20 | क्षेत्रीय पहचान | गढ़वा जिले की प्रमुख धार्मिक पहचान |