झारखण्ड के प्रमुख मेले | स्थान, समय एवं विशेषताएँ | परम्परा, आस्था और संस्कृति का संगम

झारखण्ड के प्रमुख मेले | स्थान, समय एवं विशेषताएँ | परम्परा, आस्था और संस्कृति का संगम

  

झारखण्ड के सभी प्रमुख जलप्रपात, झीलें एवं विशिष्ट जलस्रोत | स्थान, ऊँचाई, नदी और विशेषताएँ

झारखण्ड के मेले

झारखण्ड अपनी प्राचीन परम्पराओं, जनजातीय संस्कृति तथा गहन धार्मिक आस्था के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में मेलों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। राज्य के विभिन्न भागों में वर्ष भर अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक एवं कृषि-आधारित मेले आयोजित होते हैं। ये मेले केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक संरक्षण तथा स्थानीय व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं। झारखण्ड के प्रमुख मेलों का विवरण निम्नलिखित है।

श्रावणी मेला

श्रावणी मेला झारखण्ड का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं विशाल धार्मिक मेला है। यह देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में श्रावण मास में आयोजित होता है। बाबा बैद्यनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है और यह देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में सम्मिलित है।

श्रावण मास में लाखों श्रद्धालु, जिन्हें कांवरिया कहा जाता है, बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर देवघर पहुँचते हैं। वे नंगे पाँव यात्रा करते हुए भगवान शिव पर जलाभिषेक करते हैं। यह मेला लगभग एक माह तक चलता है। इस अवसर पर राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा, स्वास्थ्य तथा यातायात की विशेष व्यवस्था की जाती है। यह मेला श्रद्धा, भक्ति एवं धार्मिक अनुशासन का प्रतीक है।

राजरप्पा मेला

राजरप्पा मेला रामगढ़ जिले में स्थित छिन्नमस्तिका मंदिर में आयोजित होता है। यह मंदिर दामोदर तथा भैरवी नदियों के संगम स्थल पर अवस्थित है। यहाँ माँ छिन्नमस्तिका की पूजा की जाती है, जिन्हें शक्ति स्वरूपा देवी माना जाता है। नवरात्रि तथा अन्य विशेष अवसरों पर यहाँ विशाल मेला लगता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं। यह मेला स्थानीय व्यापार एवं पर्यटन को भी बढ़ावा देता है।

हिजला मेला

हिजला मेला दुमका जिले में मायूराक्षी नदी के तट पर आयोजित होता है। इसकी स्थापना सन् 1890 में ब्रिटिश काल में की गई थी। यह झारखण्ड का एक प्रमुख जनजातीय मेला है। इस मेले का मुख्य उद्देश्य जनजातीय कला एवं संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। विभिन्न जनजातीय समुदाय अपने पारंपरिक नृत्य, गीत एवं हस्तशिल्प का प्रदर्शन करते हैं। यह मेला सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण माध्यम है।

इंद जतरा

इंद जतरा झारखण्ड का एक पारंपरिक कृषि-आधारित मेला है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत नागवंशी शासकों के समय में हुई थी। यह मुख्यतः राँची एवं आसपास के क्षेत्रों में आयोजित होता है। इस मेले का उद्देश्य वर्षा की प्रार्थना तथा अच्छी फसल की कामना करना है। ग्रामीण लोग सामूहिक पूजा, नृत्य एवं अनुष्ठान करते हैं। यह मेला राज्य की कृषि प्रधान संस्कृति को दर्शाता है।

जगन्नाथपुर मेला

जगन्नाथपुर मेला राँची स्थित जगन्नाथ मंदिर में आषाढ़ माह में रथयात्रा के अवसर पर आयोजित होता है। इस मंदिर का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में नागवंशी शासकों द्वारा कराया गया था। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की शोभायात्रा निकाली जाती है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। मेले में अस्थायी दुकानें, झूले एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

टुसू मेला

टुसू मेला मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष रूप से पंचपरगना क्षेत्र में मनाया जाता है। यह कृषि एवं ऋतु परिवर्तन से संबंधित मेला है। अविवाहित युवतियाँ टुसू देवी की प्रतिमा बनाकर पारंपरिक गीत गाती हैं। संक्रांति के दिन इन प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। यह मेला ग्रामीण जीवन, समृद्धि एवं सांस्कृतिक परम्परा का प्रतीक है।

रामरेखा मेला

रामरेखा मेला सिमडेगा जिले में स्थित रामरेखा धाम में आयोजित होता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान राम वनवास काल में यहाँ ठहरे थे। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ मेला लगता है। श्रद्धालु स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं। यह क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक स्थल है।

लंगटा बाबा मेला

लंगटा बाबा मेला गिरिडीह जिले में संत लंगटा बाबा की स्मृति में आयोजित किया जाता है। श्रद्धालु यहाँ आकर पूजा-अर्चना करते हैं तथा आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह मेला सामाजिक समरसता का प्रतीक है।

बिसुआ मेला

बिसुआ मेला प्रत्येक वर्ष अप्रैल माह में मनाया जाता है। यह जनजातीय नववर्ष का प्रतीक है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में पारंपरिक नृत्य, गीत एवं सामूहिक आयोजन किए जाते हैं।

भदली मेला

भदली मेला झारखण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से कृषि चक्र से संबंधित अवसरों पर आयोजित किया जाता है। यह मेला वर्षा ऋतु के पश्चात् आयोजित होता है तथा अच्छी फसल की कामना से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण समुदाय सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करते हैं और लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। यह मेला ग्रामीण जीवन की सादगी एवं सामूहिकता को दर्शाता है।

करमा मेला

करमा पर्व झारखण्ड की जनजातीय संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इसके अवसर पर कई क्षेत्रों में करमा मेला आयोजित किया जाता है। युवक-युवतियाँ करम वृक्ष की डाली की पूजा करते हैं तथा करमा नृत्य प्रस्तुत करते हैं। यह मेला सामाजिक समरसता, प्रकृति-पूजा तथा सामुदायिक एकता का प्रतीक है।

सोहराय मेला

सोहराय पर्व मुख्यतः पशुधन एवं कृषि से संबंधित है। इस अवसर पर कई स्थानों पर मेला आयोजित होता है। ग्रामीण लोग अपने पशुओं को सजाते हैं तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। यह पर्व कृषि प्रधान जीवन तथा पशुधन के महत्व को दर्शाता है।

माघ मेला

माघ मास में कई धार्मिक स्थलों पर मेला आयोजित किया जाता है। श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं। यह मेला धार्मिक श्रद्धा एवं आध्यात्मिक विश्वास का प्रतीक है।

भूत मेला

भूत मेला झारखण्ड के पलामू क्षेत्र में आयोजित होने वाला एक विशिष्ट पारंपरिक मेला है। यह मेला स्थानीय जनजातीय समुदायों की प्राचीन आस्थाओं एवं लोकविश्वासों से संबंधित है। ग्रामीण समाज में आत्मा, अदृश्य शक्तियों तथा अलौकिक प्रभावों के प्रति जो मान्यताएँ प्रचलित हैं, उनका प्रतिबिंब इस मेले में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस अवसर पर लोग विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान एवं पूजा-पाठ करते हैं। अनेक श्रद्धालु रोगों से मुक्ति तथा जीवन की कठिनाइयों को दूर करने की कामना से यहाँ उपस्थित होते हैं। पारंपरिक ओझा-गुणी तथा स्थानीय पुजारी विशेष विधि-विधान द्वारा पूजा संपन्न कराते हैं। यह मेला ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, लोकचिकित्सा विश्वासों तथा सामुदायिक सहभागिता का द्योतक है।

मुदमा जतरा

मुदमा जतरा राँची जिले में आयोजित एक महत्वपूर्ण जनजातीय मेला है। यह मेला स्थानीय देवता की आराधना से संबंधित है और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार मनाया जाता है। ग्रामीण समुदाय सामूहिक रूप से एकत्रित होकर अपने ग्राम देवता की पूजा-अर्चना करते हैं। इस अवसर पर विविध धार्मिक अनुष्ठान, पारंपरिक नृत्य तथा लोकगीत प्रस्तुत किए जाते हैं। मेले में सामूहिक सहभागिता का विशेष महत्व होता है, जिससे सामाजिक एकता एवं पारस्परिक सहयोग की भावना सुदृढ़ होती है। मुदमा जतरा झारखण्ड की जनजातीय सांस्कृतिक पहचान का एक जीवंत उदाहरण है।

नूनबिल मेला

नूनबिल मेला दुमका जिले में नूनबिल नदी के तट पर मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित किया जाता है। यह मेला धार्मिक आस्था एवं ग्रामीण जीवन शैली का प्रतीक है। मकर संक्रांति के दिन श्रद्धालु पवित्र स्नान करते हैं तथा धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं। मेले में ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। अस्थायी दुकानों, पारंपरिक वस्तुओं तथा स्थानीय उत्पादों की बिक्री भी इस अवसर पर होती है। यह मेला न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी प्रमुख माध्यम है।

निष्कर्ष

झारखण्ड के मेले राज्य की सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक आस्था एवं जनजातीय परम्पराओं के जीवंत प्रतीक हैं। ये मेले सामाजिक एकता को सुदृढ़ करते हैं तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते हैं। इस प्रकार, झारखण्ड के मेले राज्य की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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झारखण्ड के प्रमुख मेले : स्थान एवं आयोजन समय

क्रम संख्या मेले का नाम आयोजन स्थल (जिला/स्थान) आयोजन का समय / अवसर
1 श्रावणी मेला देवघर (बाबा बैद्यनाथ धाम) श्रावण मास (जुलाई–अगस्त)
2 राजरप्पा मेला राजरप्पा, रामगढ़ नवरात्रि एवं अन्य विशेष अवसर
3 हिजला मेला दुमका (मयूराक्षी नदी तट) सामान्यतः फरवरी माह
4 इंद जतरा राँची एवं आसपास क्षेत्र भाद्र मास (अगस्त–सितंबर)
5 जगन्नाथपुर मेला राँची (जगन्नाथ मंदिर) आषाढ़ मास, रथयात्रा
6 टुसू मेला पंचपरगना क्षेत्र (राँची, सरायकेला आदि) मकर संक्रांति (14 जनवरी)
7 रामरेखा मेला सिमडेगा (रामरेखा धाम) कार्तिक पूर्णिमा
8 लंगटा बाबा मेला गिरिडीह वार्षिक (स्थानीय तिथि अनुसार)
9 बिसुआ मेला विभिन्न जनजातीय क्षेत्र लगभग 14 अप्रैल (जनजातीय नववर्ष)
10 भदली मेला ग्रामीण कृषि क्षेत्र वर्षा ऋतु के पश्चात
11 करमा मेला राँची, गुमला, लोहरदगा आदि भाद्र मास (करमा पर्व)
12 सोहराय मेला संथाल परगना एवं अन्य ग्रामीण क्षेत्र दीपावली के पश्चात (अक्टूबर–नवंबर)
13 माघ मेला विभिन्न धार्मिक स्थल माघ मास (जनवरी–फरवरी)
14 भूत मेला पलामू क्षेत्र स्थानीय परंपरा अनुसार (वार्षिक)
15 मुदमा जतरा राँची जिला पारंपरिक तिथि अनुसार (जनजातीय पर्व)
16 नूनबिल मेला दुमका (नूनबिल नदी तट) मकर संक्रांति


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