आदिवासी प्रतिरोध की आरंभिक ज्वाला
झारखंड का इतिहास केवल प्राकृतिक संपदा, जनजातीय संस्कृति और परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, विद्रोह और स्वाभिमान की अद्वितीय गाथाओं से भी ओतप्रोत है। 18वीं शताब्दी के मध्य से लेकर 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक इस क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अनेक सशस्त्र और सामाजिक आंदोलन हुए। इन आंदोलनों का मूल कारण केवल राजनीतिक दासता नहीं था, बल्कि भूमि-अधिकारों का हनन, अत्यधिक कर-व्यवस्था, जंगलों पर नियंत्रण, महाजनी शोषण, जमींदारी अत्याचार तथा सांस्कृतिक हस्तक्षेप भी था। 1765 ईस्वी में जब ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई, तब राजस्व वसूली की नई व्यवस्था लागू की गई। छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक ‘खुंटकट्टी’ और सामुदायिक भूमि व्यवस्था को कमजोर कर बाहरी जमींदारों और ठेकेदारों को अधिकार दिए गए। इससे आदिवासी समाज की आर्थिक रीढ़ टूटने लगी। इसी अन्याय के विरुद्ध झारखंड की धरती से प्रतिरोध की पहली सशक्त आवाज उठी।
तिलका मांझी (लगभग 1750 – 1785)
झारखंड क्षेत्र के प्रथम संगठित आदिवासी क्रांतिकारी के रूप में तिलका मांझी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जन्म 18वीं शताब्दी के मध्य में संथाल समुदाय में हुआ था। उनका मूल नाम जाबरा पहाड़िया माना जाता है। वे राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्र में सक्रिय थे। 1770 के भयानक अकाल ने बंगाल और बिहार क्षेत्र को झकझोर दिया। लाखों लोग भूख से मर गए, परंतु अंग्रेजों ने कर-वसूली में कोई राहत नहीं दी। भागलपुर और राजमहल क्षेत्र में अंग्रेज अधिकारी ऑगस्टस क्लीवलैंड को आदिवासी क्षेत्रों को नियंत्रित करने का दायित्व सौंपा गया। उसने आदिवासियों को अपने अधीन करने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। तिलका मांझी ने इस नीति का विरोध किया। उन्होंने आदिवासियों को संगठित कर गुरिल्ला पद्धति से संघर्ष आरंभ किया। वे जंगलों और पहाड़ियों से अंग्रेज चौकियों पर अचानक आक्रमण करते थे। 1784 ईस्वी में उन्होंने तीर से क्लीवलैंड को गंभीर रूप से घायल कर दिया। यह घटना अंग्रेजी प्रशासन के लिए चुनौती बन गई। इसके बाद अंग्रेजों ने व्यापक सैन्य अभियान चलाया। तिलका मांझी को पकड़ लिया गया। कहा जाता है कि उन्हें घोड़े से बांधकर भागलपुर तक घसीटा गया। 1785 में उन्हें एक बरगद के वृक्ष पर फांसी दे दी गई। उनका बलिदान झारखंड में स्वतंत्रता चेतना की प्रथम सशक्त अभिव्यक्ति था।
कोल विद्रोह और बुद्धु भगत (1792 – 1832)
19वीं शताब्दी के प्रारंभ में छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजों ने नई भूमि-व्यवस्था लागू की। बाहरी जमींदारों और महाजनों ने आदिवासियों की भूमि हड़पनी शुरू कर दी। इससे व्यापक असंतोष फैल गया। 1831-32 में यह असंतोष ‘कोल विद्रोह’ के रूप में फूट पड़ा। बुद्धु भगत का जन्म 17 फरवरी 1792 को रांची जिले के सिलागई गाँव में उरांव समुदाय में हुआ था। वे कोल विद्रोह के प्रमुख नेता बने। उन्होंने लगभग 700 साथियों के साथ अंग्रेजी ठिकानों और जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष किया। सिंहभूम, रांची और हजारीबाग क्षेत्रों में विद्रोह फैल गया। अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया। 1832 में संघर्ष के दौरान बुद्धु भगत शहीद हो गए। कोल विद्रोह ने अंग्रेजों को यह एहसास कराया कि आदिवासी क्षेत्रों में उनकी नीतियाँ गंभीर असंतोष पैदा कर रही हैं।
वीर तेलंगा खड़िया (9 फरवरी 1806 – 23 अप्रैल 1880)
तेलंगा खड़िया का जन्म गुमला जिले में खड़िया जनजाति में हुआ। उन्होंने खड़िया समुदाय को संगठित कर अंग्रेजों और जमींदारों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया। वे गुरिल्ला युद्ध में निपुण थे। उन्होंने ग्रामीण युवकों को सैन्य प्रशिक्षण दिया। अंग्रेजों ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया। अंततः 23 अप्रैल 1880 को उन्हें फांसी दे दी गई। वे खड़िया समाज के गौरव और प्रतिरोध के प्रतीक हैं।
संथाल हूल (1855-56) – सिदो, कान्हू, चांद और भैरव
30 जून 1855 को भगनाडीह गाँव (वर्तमान साहिबगंज जिला) में संथाल समुदाय के चार भाइयों – सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू – ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा की। इस आंदोलन को ‘संथाल हूल’ कहा जाता है। संथाल परगना क्षेत्र में महाजनों, जमींदारों और पुलिस अधिकारियों द्वारा अत्यधिक शोषण हो रहा था। संथालों से ऊँचे ब्याज पर ऋण लिया जाता और भूमि छीन ली जाती। सिदो-कान्हू ने हजारों लोगों को संगठित किया और स्वशासन की घोषणा की। अंग्रेजों ने मार्शल लॉ लागू किया। हजारों संथाल मारे गए। 1856 में सिदो और कान्हू को पकड़कर फांसी दे दी गई। यह विद्रोह 1857 की क्रांति से पूर्व का सबसे बड़ा आदिवासी जनांदोलन था।
फूलो और झानो मुर्मू
संथाल हूल (1855-56) केवल पुरुष नेतृत्व तक सीमित आंदोलन नहीं था, बल्कि इसमें महिलाओं की भी सक्रिय और साहसिक भूमिका थी। फूलो और झानो मुर्मू, सिदो और कान्हू मुर्मू की बहनें थीं। जब 30 जून 1855 को भगनाडीह गाँव में संथाल हूल की घोषणा हुई, तब हजारों पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी युद्ध की तैयारी की। फूलो और झानो ने संथाल महिलाओं को संगठित किया। वे पारंपरिक हथियार—तीर, धनुष, फरसा और भाला—लेकर अंग्रेजी सेना के विरुद्ध मैदान में उतरीं। लोककथाओं में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने कई अंग्रेज सैनिकों का सामना किया और युद्ध में अद्भुत साहस दिखाया। संथाल हूल के दमन के दौरान अंग्रेजों ने अत्यंत क्रूरता दिखाई। हजारों संथाल मारे गए। फूलो-झानो भी संघर्ष करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं। वे आदिवासी नारी-शक्ति और बलिदान की अमर प्रतीक हैं।
नीलांबर और पीतांबर (पलामू विद्रोह, 1857-58)
1857 की क्रांति की ज्वाला जब उत्तर भारत से फैलती हुई झारखंड पहुँची, तब पलामू क्षेत्र में चेरो समुदाय के दो वीर भाई—नीलांबर और पीतांबर—ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। दोनों भाइयों ने स्थानीय किसानों और आदिवासियों को संगठित कर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। उन्होंने पलामू किले और आसपास के क्षेत्रों में क्रांतिकारी गतिविधियाँ संचालित कीं। अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए भारी सैन्य बल भेजा। संघर्ष के बाद दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया गया। 1858 ईस्वी में उन्हें फांसी दे दी गई।
विश्वनाथ शाहदेव (1817 – 16 अप्रैल 1858)
विश्वनाथ शाहदेव का जन्म 1817 में रांची क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में हुआ। वे हटिया (रांची) क्षेत्र के जमींदार थे। 1857 की क्रांति के समय उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खुलकर मोर्चा संभाला। उन्होंने स्थानीय सैनिकों और जनता को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान चलाया। रांची और आसपास के क्षेत्रों में विद्रोह की लहर फैल गई। अंग्रेजों ने कठोर कार्रवाई करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 16 अप्रैल 1858 को रांची में उन्हें फांसी दे दी गई।
पांडेय गणपत राय (1809 – 21 अप्रैल 1858)
पांडेय गणपत राय का जन्म 1809 में हुआ। वे नागवंशी शासकों के प्रशासन से जुड़े हुए थे और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्होंने विश्वनाथ शाहदेव के साथ मिलकर रांची क्षेत्र में क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित किया। अंग्रेजों के विरुद्ध कई मोर्चों पर संघर्ष हुआ। अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 21 अप्रैल 1858 को फांसी दे दी गई। वे झारखंड में राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूतों में गिने जाते हैं।
टिकैत उमराव सिंह (मृत्यु – 8 जनवरी 1858)
टिकैत उमराव सिंह 1857 की क्रांति के प्रमुख योद्धाओं में थे। वे ओरमांझी क्षेत्र से संबंधित थे। उन्होंने अंग्रेजी सेना के आवागमन को रोकने के लिए रणनीतिक कदम उठाए। चुटुपालू घाटी में उन्होंने मार्ग अवरुद्ध कर अंग्रेजी सेना की प्रगति को बाधित किया। यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 8 जनवरी 1858 को उन्हें फांसी दे दी गई। उनका बलिदान स्थानीय सैन्य प्रतिरोध का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
शेख भिखारी (मृत्यु – 8 जनवरी 1858)
शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह के विश्वस्त सहयोगी थे। वे एक कुशल रणनीतिकार और साहसी योद्धा थे। उन्होंने चुटुपालू घाटी में अंग्रेजी सेना को रोकने की योजना बनाई। दोनों नेताओं ने मिलकर पुल और मार्गों को क्षतिग्रस्त कर अंग्रेजों की प्रगति रोकने का प्रयास किया। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और 8 जनवरी 1858 को रांची के निकट फांसी दे दी। शेख भिखारी हिंदू-मुस्लिम एकता और संयुक्त संघर्ष के प्रतीक माने जाते हैं।
जतरा भगत और ताना भगत आंदोलन
जतरा भगत का जन्म गुमला जिले के विशुनपुर क्षेत्र में उरांव समुदाय में हुआ था। 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में उन्होंने ‘ताना भगत आंदोलन’ की शुरुआत की। यह आंदोलन सामाजिक सुधार, शराबबंदी, स्वच्छता, अंधविश्वास-त्याग और अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित था। ताना भगत अनुयायी सफेद वस्त्र धारण करते थे और अनुशासित जीवन जीते थे। बाद में यह आंदोलन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित हुआ। ताना भगतों ने कर न देने और अंग्रेजी शासन का बहिष्कार करने की नीति अपनाई। जतरा भगत ने आदिवासी समाज को नैतिक और सामाजिक आधार पर संगठित किया। उनका आंदोलन झारखंड में अहिंसक प्रतिरोध की महत्वपूर्ण कड़ी है।
बिरसा मुंडा (15 नवम्बर 1875 – 9 जून 1900)
बिरसा मुंडा झारखंड के इतिहास में सर्वाधिक प्रभावशाली और लोकप्रिय क्रांतिकारी थे। उनका जन्म 15 नवम्बर 1875 को खूंटी जिले के उलिहातु गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हातू था। प्रारंभिक शिक्षा जर्मन मिशन स्कूल में हुई। युवावस्था में उन्होंने मुंडा समाज की समस्याओं को गहराई से समझा। अंग्रेजों ने ‘जागीरदारी’ और ‘ठिकेदारी’ व्यवस्था लागू कर पारंपरिक ‘खुंटकट्टी’ भूमि प्रणाली को नष्ट कर दिया था। बिरसा ने धार्मिक और सामाजिक जागरण का अभियान चलाया। उन्होंने स्वयं को ‘धरती आबा’ (पृथ्वी पिता) के रूप में स्थापित किया। उनका नारा था— “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” अर्थात “अपना देश, अपना शासन”। 1895 में उन्हें पहली बार गिरफ्तार कर दो वर्ष की सजा दी गई। रिहाई के बाद उन्होंने आंदोलन को पुनः संगठित किया। 1899-1900 के बीच ‘उलगुलान’ अर्थात महाविद्रोह अपने चरम पर पहुँचा। डोम्बारी पहाड़ी सहित कई स्थानों पर संघर्ष हुए। ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी पर 500 रुपये का इनाम घोषित किया। 3 फरवरी 1900 को उन्हें चक्रधरपुर क्षेत्र के जंगलों से गिरफ्तार कर लिया गया। 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मृत्यु हो गई। आधिकारिक रूप से मृत्यु का कारण हैजा बताया गया, किंतु परिस्थितियाँ संदिग्ध थीं। वे मात्र 25 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। उनके आंदोलन के परिणामस्वरूप 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू किया गया, जिससे आदिवासियों के भूमि अधिकारों को कुछ हद तक संरक्षण मिला। बिरसा मुंडा आज भी आदिवासी अस्मिता और प्रतिरोध के महानायक माने जाते हैं।
पोटो सरदार (1837–38 का हो विद्रोह)
कोल विद्रोह (1820–21 तथा 1831–32) के बाद भी अंग्रेजी शासन का दमन जारी रहा। 1837 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने विद्रोह-प्रभावित गाँवों में अपनी प्रशासनिक व्यवस्था सख्ती से लागू करनी शुरू कर दी। इसी क्रम में दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी की स्थापना की गई और कैप्टन थॉमस विल्किन्सन को उसका एजेंट नियुक्त किया गया। परंतु कोल्हान क्षेत्र के हो समुदाय ने इसे स्वीकार नहीं किया। सरेंगसिया घाटी (तांतों प्रखंड, कोल्हान) के राजहसाई क्षेत्र के नेता पोटो सरदार के नेतृत्व में 1837 में पुनः विद्रोह भड़क उठा। हो विद्रोहियों ने वालनिया में गुप्त सभाएँ कीं। निर्णय लिया गया कि सेरेंगसिया और बगालिया घाटियों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया जाएगा। ग्राम प्रधानों ने परंपरागत रीति से तीर भेजकर लोगों को विद्रोह में सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया। आंदोलन आरंभ होते ही अंग्रेज चकित रह गए; उन्हें अनुमान नहीं था कि आदिवासी इतने संगठित और साहसी प्रतिरोध करेंगे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 12 नवंबर 1837 को चाईबासा में विल्किन्सन ने अपने अधिकारियों की बैठक बुलाई। 17 नवंबर 1837 को कैप्टन आर्मस्ट्रॉन्ग के नेतृत्व में लगभग 400 सशस्त्र सैनिक, 60 घुड़सवार तथा तोपों के साथ दमन अभियान चलाया गया। पोटो सरदार को इसकी सूचना मिल गई। 19 नवंबर 1837 को उनके नेतृत्व में विद्रोही दल ने आर्मस्ट्रॉन्ग की टुकड़ी पर आक्रमण कर दिया। भीषण युद्ध हुआ और कंपनी सेना को कई स्थानों पर पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद अंग्रेजों ने प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की। पोटो सरदार के गाँव तथा आसपास की बस्तियों पर हमला किया गया। उनके पिता को बंदी बना लिया गया। ताड़ाघन (ताड़ागढ़) गाँव को आग के हवाले कर दिया गया और विद्रोह को निर्दयता से कुचलने का प्रयास किया गया। अंततः 8 दिसंबर 1837 को पोटो सरदार गिरफ्तार कर लिए गए। 1 जनवरी 1838 को पोटो सरदार के साथ “नारो हो” और “बड़े हो” को जगन्नाथपुर में फाँसी दी गई। अगले दिन, 2 जनवरी 1838 को “बोदो हो” और “पांडुआ हो” को सेरेंगसिया गाँव में सार्वजनिक रूप से फाँसी पर चढ़ाया गया। पोटो सरदार और उनके साथियों का यह बलिदान कोल्हान क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आदिवासी स्वाभिमान और प्रतिरोध का महत्वपूर्ण अध्याय है।
आंदोलन का व्यापक प्रभाव
झारखंड के इन क्रांतिकारियों के संघर्ष केवल स्थानीय विद्रोह नहीं थे। इन आंदोलनों ने अंग्रेजों को बार-बार अपनी नीतियों में संशोधन करने के लिए बाध्य किया। संथाल हूल के बाद ‘संथाल परगना टेनेंसी कानून’ अस्तित्व में आया। बिरसा आंदोलन के बाद ‘छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम’ लागू हुआ। इन आंदोलनों ने यह सिद्ध कर दिया कि आदिवासी समाज अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है।
निष्कर्ष
झारखंड के स्वतंत्रता सेनानियों का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आधारशिला है। इन वीरों ने अंग्रेजी शासन, जमींदारी शोषण और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया। तिलका मांझी से लेकर बिरसा मुंडा तक, सिदो-कान्हू से लेकर नीलांबर-पीतांबर तक, विश्वनाथ शाहदेव से लेकर शेख भिखारी तक—इन सभी ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया। झारखंड की यह पावन भूमि सदैव इन अमर शहीदों की ऋणी रहेगी।
झारखण्ड की आदिवासी संस्कृति | प्रमुख पर्व, परम्पराएँ और धार्मिक आस्थाओं का सम्पूर्ण विवरण
झारखण्ड की कला और संस्कृति | स्थापत्य, कोहबर, सोहराय, जादोपटिया एवं लोकपरंपराएँ
झारखंड के प्रमुख क्रांतिकारियों का समेकित सार–सारणी
| क्रम | क्रांतिकारी | जीवनकाल / सक्रिय काल | क्षेत्र | संबंधित आंदोलन | प्रमुख घटनाएँ | ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | तिलका मांझी | लगभग 1750–1785 | राजमहल पहाड़ियाँ | प्रारंभिक आदिवासी विद्रोह | 1784 में क्लीवलैंड पर तीर चलाया; 1785 में फाँसी | झारखंड के प्रथम संगठित आदिवासी क्रांतिकारी |
| 2 | बुद्धु भगत | 1792–1832 | सिलागई (रांची) | कोल विद्रोह (1831–32) | 700 साथियों के साथ संघर्ष; 1832 में शहीद | कोल विद्रोह के प्रमुख नेता |
| 3 | वीर तेलंगा खड़िया | 1806–1880 | गुमला क्षेत्र | खड़िया प्रतिरोध | गुरिल्ला युद्ध; 23 अप्रैल 1880 को फाँसी | खड़िया समाज के प्रमुख योद्धा |
| 4 | सिदो मुर्मू | सक्रिय 1855–56 | भगनाडीह (साहिबगंज) | संथाल हूल | 30 जून 1855 को विद्रोह की घोषणा; 1856 में फाँसी | संथाल हूल के मुख्य नेता |
| 5 | कान्हू मुर्मू | सक्रिय 1855–56 | संथाल परगना | संथाल हूल | सिदो के साथ नेतृत्व; 1856 में फाँसी | संथाल प्रतिरोध के अग्रदूत |
| 6 | चांद मुर्मू | सक्रिय 1855–56 | संथाल परगना | संथाल हूल | विद्रोही नेतृत्व में सक्रिय | संथाल हूल के सह-नेता |
| 7 | भैरव मुर्मू | सक्रिय 1855–56 | संथाल परगना | संथाल हूल | विद्रोह में नेतृत्व | संथाल आंदोलन के प्रमुख सहयोगी |
| 8 | फूलो मुर्मू | 1855–56 | संथाल परगना | संथाल हूल | महिलाओं को संगठित किया; युद्ध में शहीद | आदिवासी नारी-शक्ति का प्रतीक |
| 9 | झानो मुर्मू | 1855–56 | संथाल परगना | संथाल हूल | अंग्रेज सेना से मुकाबला; वीरगति | महिला नेतृत्व का ऐतिहासिक उदाहरण |
| 10 | नीलांबर | 1857–58 | पलामू | 1857 का विद्रोह | अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध; 1858 में फाँसी | पलामू प्रतिरोध के नेता |
| 11 | पीतांबर | 1857–58 | पलामू | 1857 का विद्रोह | नीलांबर के साथ नेतृत्व; 1858 में फाँसी | 1857 में झारखंड का प्रतिनिधित्व |
| 12 | विश्वनाथ शाहदेव | 1817–1858 | रांची (हटिया) | 1857 का विद्रोह | 16 अप्रैल 1858 को फाँसी | झारखंड में 1857 क्रांति के प्रमुख नेता |
| 13 | पांडेय गणपत राय | 1809–1858 | रांची | 1857 का विद्रोह | 21 अप्रैल 1858 को फाँसी | राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत |
| 14 | टिकैत उमराव सिंह | मृत्यु 8 जनवरी 1858 | ओरमांझी | 1857 का विद्रोह | चुटुपालू घाटी अवरुद्ध; 8 जनवरी 1858 फाँसी | सामरिक प्रतिरोध के प्रतीक |
| 15 | शेख भिखारी | मृत्यु 8 जनवरी 1858 | रांची क्षेत्र | 1857 का विद्रोह | मार्ग ध्वस्त कर सेना रोकी; 8 जनवरी 1858 फाँसी | हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक |
| 16 | जतरा भगत | 20वीं सदी प्रारंभ | विशुनपुर (गुमला) | ताना भगत आंदोलन | सामाजिक सुधार, कर-विरोध | अहिंसक आदिवासी आंदोलन के नेता |
| 17 | बिरसा मुंडा | 1875–1900 | उलिहातु (खूंटी) | उलगुलान (1899–1900) | 1895 गिरफ्तारी; 1900 जेल में मृत्यु | ‘धरती आबा’, भूमि-अधिकार आंदोलन के महानायक |
| 18 | पोटो सरदार | 1837–38 | सरेंगसिया घाटी (कोल्हान) | हो विद्रोह | 19 नव 1837 युद्ध; 1 जनवरी 1838 फाँसी | कोल्हान प्रतिरोध के अग्रणी नेता |
| 19 | नारो हो | 1837–38 | कोल्हान | हो विद्रोह | 1 जनवरी 1838 फाँसी | पोटो सरदार के सहयोगी |
| 20 | बड़े हो | 1837–38 | कोल्हान | हो विद्रोह | 1 जनवरी 1838 फाँसी | हो प्रतिरोध के योद्धा |
| 21 | बोदो हो | 1837–38 | सेरेंगसिया | हो विद्रोह | 2 जनवरी 1838 सार्वजनिक फाँसी | हो आंदोलन के सेनानी |
| 22 | पांडुआ हो | 1837–38 | सेरेंगसिया | हो विद्रोह | 2 जनवरी 1838 सार्वजनिक फाँसी | हो विद्रोह के बलिदानी |
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