झारखण्ड की कला और संस्कृति | स्थापत्य, कोहबर, सोहराय, जादोपटिया एवं लोकपरंपराएँ

झारखण्ड की कला और संस्कृति | स्थापत्य, कोहबर, सोहराय, जादोपटिया एवं लोकपरंपराएँ

  

झारखण्ड की पारम्परिक कला एवं संस्कृति

झारखण्ड के सभी प्रमुख जलप्रपात, झीलें एवं विशिष्ट जलस्रोत | स्थान, ऊँचाई, नदी और विशेषताएँ

झारखण्ड की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत प्राचीन, बहुआयामी एवं समृद्ध रही है। यहाँ की जनजातीय परंपराएँ, स्थापत्य कला, चित्रकला, मूर्तिकला, लोकनृत्य, लोकसाहित्य तथा प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियाँ इस प्रदेश की विशिष्ट पहचान हैं। प्रकृति के निकट जीवनयापन करने वाले समाज ने अपनी आस्था, परंपरा और दैनिक जीवन को कला के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। झारखण्ड की कला केवल सौंदर्य प्रदर्शन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है।

1. स्थापत्य कला 

झारखण्ड की स्थापत्य परंपरा विभिन्न ऐतिहासिक कालों में विकसित हुई। प्राचीन समय से ही यहाँ विभिन्न राजवंशों का शासन रहा, जिन्होंने मंदिरों, दुर्गों, स्मारकों तथा धार्मिक स्थलों का निर्माण कराया। इन निर्माणों में स्थानीय सामग्री जैसे पत्थर, लकड़ी और मिट्टी का उपयोग प्रमुखता से किया गया।जनजातीय समाज में मकानों के निर्माण की परंपरा अत्यंत सरल किंतु कलात्मक रही है। मिट्टी की दीवारें, लकड़ी के खंभे तथा फूस या घास की छतें इनके घरों की विशेषता रही हैं। इन घरों की संरचना पर्यावरण के अनुकूल होती थी, जिससे वर्षा, धूप और ठंड से सुरक्षा मिल सके। कुछ स्थानों पर गोलाकार झोपड़ियाँ तथा ढलानदार छतों वाले मकान भी बनाए जाते थे।

झारखण्ड के प्रमुख मेले | स्थान, समय एवं विशेषताएँ | परम्परा, आस्था और संस्कृति का संगम

कालांतर में बाहरी संस्कृतियों और शासकों का प्रभाव झारखण्ड की स्थापत्य शैली पर पड़ा। विशेष रूप से उड़ीसा शैली के मंदिर स्थापत्य का प्रभाव कई प्राचीन मंदिरों में स्पष्ट दिखाई देता है। मध्यकाल में बने किलों और दुर्गों में सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत निर्माण तकनीक अपनाई गई।उन्नीसवीं शताब्दी के बाद आधुनिक निर्माण शैली का विकास हुआ। ईंट, चूना और पत्थर से स्थायी भवनों का निर्माण बढ़ा। ईसाई मिशनरियों द्वारा निर्मित चर्चों में गोथिक शैली की झलक देखने को मिलती है, जिसमें ऊँचे शिखर, मेहराबदार द्वार और रंगीन काँच की खिड़कियाँ प्रमुख होती हैं।इस प्रकार झारखण्ड की स्थापत्य कला में परंपरा, उपयोगिता और सौंदर्य का संतुलित समन्वय दृष्टिगोचर होता है।

2. चित्रकला 

झारखण्ड की जनजातियाँ चित्रकला में अत्यंत रुचि रखती हैं। यह कला मुख्यतः घरों की दीवारों, आँगनों और पूजा स्थलों पर अभिव्यक्त होती है। दीवारों पर पहले मिट्टी की चिकनी परत चढ़ाई जाती है, तत्पश्चात प्राकृतिक रंगों से विभिन्न आकृतियाँ उकेरी जाती हैं।चित्रों में सूर्य, चन्द्रमा, पशु-पक्षी, वृक्ष, फूल-पत्तियाँ, देवी-देवता तथा दैनिक जीवन के दृश्य प्रमुख रूप से अंकित किए जाते हैं। इन चित्रों का उद्देश्य केवल सजावट नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, शुभ अवसरों की अभिव्यक्ति और प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करना भी होता है।संथाल और उरांव जनजातियों में चित्रकला विशेष रूप से प्रचलित है। विवाह, पर्व-त्योहार और धार्मिक अनुष्ठानों के अवसर पर घरों को विशेष रूप से सजाया जाता है। रंगों के रूप में लाल मिट्टी, कोयला, चूना तथा अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त रंगों का उपयोग किया जाता है।

झारखण्ड की आदिवासी संस्कृति | प्रमुख पर्व, परम्पराएँ और धार्मिक आस्थाओं का सम्पूर्ण विवरण

प्रमुख लोक चित्र शैलियाँ

(क) कोहबर चित्रकला

कोहबर चित्रकला का संबंध मुख्यतः विवाह से है। इसमें उर्वरता, दांपत्य जीवन, प्रकृति और जीवन चक्र से जुड़े प्रतीक बनाए जाते हैं। इस शैली की जड़ें प्राचीन गुफा चित्रों से जुड़ी मानी जाती हैं। चित्रों में वृक्ष, कमल, मछली, पक्षी और मानव आकृतियाँ प्रतीकात्मक रूप में अंकित की जाती हैं।

(ख) सोहराय चित्रकला

सोहराय पर्व के अवसर पर बनाई जाने वाली यह चित्रकला पशुधन और कृषि जीवन से संबंधित है। दीवारों पर लाल, सफेद, काला और मिट्टी के रंगों से चित्र बनाए जाते हैं। पशुओं की आकृतियाँ विशेष रूप से उकेरी जाती हैं, जो ग्रामीण जीवन और आजीविका का प्रतीक हैं।

(ग) जादोपटिया चित्रकला

जादोपटिया शैली लोककथाओं और धार्मिक कथाओं पर आधारित है। इसमें लंबे कागज या कपड़े पर क्रमबद्ध चित्र बनाकर कहानी का वर्णन किया जाता है। चित्रों के माध्यम से रामायण, महाभारत तथा स्थानीय लोकगाथाओं का प्रस्तुतीकरण किया जाता है। इस कला में चित्र और कथावाचन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

3. मूर्तिकला एवं हस्तकला 

झारखण्ड के जनजातीय जीवन में हस्तकला और मूर्तिकला का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्रारंभिक काल में लोग अपने दैनिक उपयोग की वस्तुएँ स्वयं तैयार करते थे। लकड़ी, पत्थर, मिट्टी और धातु से विभिन्न प्रकार की उपयोगी एवं सजावटी वस्तुएँ बनाई जाती थीं।डोकरा कला यहाँ की प्रसिद्ध धातु शिल्प परंपरा है, जिसमें मोम ढलाई पद्धति द्वारा कलात्मक मूर्तियाँ निर्मित की जाती हैं। पशु-पक्षी, मानव आकृतियाँ, देवी-देवता और आभूषण इस कला के प्रमुख विषय हैं।इसके अतिरिक्त बाँस और लकड़ी से टोकरी, उपकरण, कृषि यंत्र तथा घरेलू सामान बनाए जाते रहे हैं। यह कला आत्मनिर्भरता और सृजनात्मकता का प्रतीक है।

4. लोकनृत्य एवं लोकनाट्य परंपरा

झारखण्ड का जनजातीय समाज संगीत, नृत्य और उत्सवप्रियता के लिए प्रसिद्ध है। प्रत्येक पर्व, विवाह और सामूहिक आयोजन में नृत्य और गीत का विशेष स्थान होता है। पुरुष और महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा धारण कर सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं।लोकनाट्य परंपरा में पौराणिक और धार्मिक कथाओं का मंचन किया जाता है। इनमें संगीत, अभिनय और नृत्य का समन्वय होता है। लोककलाएँ सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

5. लोक साहित्य

झारखण्ड का लोक साहित्य मौखिक परंपरा पर आधारित है।

(क) लोककथाएँ

पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाने वाली लोककथाएँ समाज के नैतिक मूल्यों, ऐतिहासिक घटनाओं और जीवन दर्शन को प्रस्तुत करती हैं।

(ख) पहेलियाँ

बौद्धिक कौशल को विकसित करने के लिए पहेलियों की परंपरा रही है। इनका प्रयोग मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा के लिए भी किया जाता है।

(ग) कहावतें और लोकोक्तियाँ

जीवन के अनुभवों से उत्पन्न कहावतें सामाजिक व्यवहार और लोकज्ञान का सार प्रस्तुत करती हैं।

6. प्रतीकवाद 

झारखण्ड की संस्कृति में प्रतीकों का अत्यंत महत्व है। सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत, वृक्ष तथा देवी-देवताओं के प्रतीक जीवन, सृष्टि और उर्वरता के द्योतक माने जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों और चित्रों में इन प्रतीकों का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है।

उपसंहार

गुरु सिंधु जलप्रपात: झारखंड–छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित एक प्रमुख प्राकृतिक पर्यटन स्थल

झारखंड आंदोलन के प्रमुख संगठन | इतिहास, नेता और राज्य निर्माण में भूमिका

झारखण्ड की पारंपरिक कला एवं संस्कृति प्रकृति, आस्था और सामुदायिक जीवन का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करती है। यहाँ की स्थापत्य कला, चित्रकला, मूर्तिकला, लोकनृत्य और लोकसाहित्य जनजातीय समाज की सृजनशीलता और सांस्कृतिक चेतना के सशक्त प्रमाण हैं। यह सांस्कृतिक धरोहर न केवल राज्य की पहचान है, बल्कि भारतीय संस्कृति की बहुरंगी परंपरा का भी महत्वपूर्ण अंग है। इसे संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना हम सभी का दायित्व है।

नीचे झारखण्ड की पारम्परिक कला एवं संस्कृति के महत्वपूर्ण बिंदुओं का एक सारणी दिया गया है, जो परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है।

झारखण्ड की पारम्परिक कला एवं संस्कृति

क्रम कला/क्षेत्र प्रमुख विशेषताएँ महत्वपूर्ण तथ्य / परीक्षा बिंदु
1 स्थापत्य कला स्थानीय सामग्री – पत्थर, लकड़ी, मिट्टी; ढलानदार छत; गोलाकार झोपड़ी उड़ीसा शैली का प्रभाव; मध्यकालीन दुर्ग; 19वीं शताब्दी में ईंट-चूना भवन; गोथिक शैली के चर्च
2 जनजातीय आवास मिट्टी की दीवार, फूस की छत, लकड़ी के खंभे पर्यावरण अनुकूल निर्माण; वर्षा और ठंड से सुरक्षा
3 चित्रकला (सामान्य) दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से चित्र सूर्य, चन्द्रमा, पशु-पक्षी, देवी-देवता; शुभ अवसरों पर सजावट
4 कोहबर चित्रकला विवाह से संबंधित प्रतीकात्मक चित्र उर्वरता, दांपत्य जीवन; कमल, मछली, वृक्ष प्रमुख प्रतीक
5 सोहराय चित्रकला सोहराय पर्व पर बनाई जाती है पशुधन, कृषि जीवन; लाल, काला, सफेद मिट्टी रंग
6 जादोपटिया चित्रकला कथा-आधारित चित्रकला रामायण, महाभारत, लोकगाथाएँ; चित्र + कथावाचन
7 डोकरा कला धातु शिल्प (मोम ढलाई पद्धति) मानव, पशु आकृतियाँ; प्रसिद्ध जनजातीय हस्तकला
8 बाँस/लकड़ी हस्तकला टोकरी, कृषि यंत्र, घरेलू वस्तुएँ आत्मनिर्भर जनजातीय अर्थव्यवस्था का प्रतीक
9 लोकनृत्य सामूहिक नृत्य; पारंपरिक वेशभूषा पर्व-त्योहार, विवाह में अनिवार्य
10 लोकनाट्य पौराणिक/धार्मिक कथाओं का मंचन संगीत, अभिनय और नृत्य का समन्वय
11 लोककथाएँ मौखिक परंपरा नैतिक मूल्य, इतिहास और जीवन दर्शन
12 पहेलियाँ बौद्धिक विकास मनोरंजन + शिक्षा
13 कहावतें/लोकोक्तियाँ लोक अनुभव का सार सामाजिक व्यवहार का मार्गदर्शन
14 प्रतीकवाद सूर्य, चन्द्र, वृक्ष, पर्वत प्रतीक जीवन, सृष्टि, उर्वरता के द्योतक


Previous Post Next Post