झारखण्ड की कला और संस्कृति | स्थापत्य, कोहबर, सोहराय, जादोपटिया एवं लोकपरंपराएँ
झारखण्ड की जनजातीय धार्मिक परम्पराएँ एवं प्रमुख पर्व
झारखण्ड की जनजातीय संस्कृति प्रकृति-पूजा, पूर्वज-आराधना तथा सामुदायिक एकता की भावना पर आधारित है। यहाँ के पर्व कृषि-चक्र, ऋतु-परिवर्तन, पशुधन-संरक्षण तथा सामाजिक संबंधों से गहराई से जुड़े हैं। प्रत्येक उत्सव में ‘पाहन’ (ग्राम पुजारी) की प्रमुख भूमिका होती है, जो पारंपरिक विधि से पूजा-संस्कार सम्पन्न कराते हैं। नीचे प्रमुख पर्वों का क्रमबद्ध एवं विस्तृत विवरण प्रस्तुत है—
1. बहुरा
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह पर्व मनाया जाता है। यह मुख्यतः महिलाओं का व्रत-उत्सव है। वर्षा ऋतु की समाप्ति तथा संतानों के उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना से महिलाएँ उपवास रखती हैं। वे पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना कर परिवार की समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे “राइज बहलाक” के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व मातृत्व-भावना और पारिवारिक कल्याण का प्रतीक है।
2. भलवा फरेक (भाक कटेका)
कादलेटा पर्व के दो या तीन दिन पश्चात यह अनुष्ठान आयोजित होता है। इस अवसर पर गाँव के पाहन प्रत्येक घर या गोशाला में जाकर पूजा-सामग्री के साथ देवता की आराधना करते हैं। पूजा में मिट्टी का चूल्हा, कोयला, अरवा चावल, चावल का आटा, मुर्गी का अंडा, हड़िया (चावल से बना पारंपरिक पेय) तथा भलवा की डाल आदि प्रयुक्त होते हैं। यह अनुष्ठान ग्राम-देवता को संतुष्ट कर सुख-शांति एवं रोग-मुक्ति की कामना के लिए किया जाता है।
3. चाँद बारेक
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में यह प्रथा प्रचलित थी। घर की वृद्ध महिलाएँ दो दिनों तक रात्रि में चंद्र-दर्शन किए बिना उपवास रखती थीं। इसका उद्देश्य पारिवारिक मंगल और संतति-सुरक्षा से जुड़ा माना जाता था। वर्तमान समय में यह परंपरा लगभग लुप्तप्राय हो चुकी है, किंतु इसका सांस्कृतिक उल्लेख अभी भी मिलता है।
4. नवाखानी (तुसगो)
करम पूजा के पश्चात जब नई फसल, विशेषकर धान (गोंदली गोड़ा धान) पककर तैयार होती है, तब यह पर्व मनाया जाता है। नए अन्न को ओखल में कूटकर चूड़ा बनाया जाता है। सर्वप्रथम देवताओं एवं पितरों को हड़िया, दही और चूड़ा अर्पित किया जाता है। इसके बाद सामूहिक रूप से नए अन्न का सेवन किया जाता है। यह पर्व कृषि-आधारित जीवन-पद्धति में नवीन अन्न के स्वागत का प्रतीक है।
5. सुरजाही पूजा
अगहन मास में सूर्य-पूजा के रूप में यह अनुष्ठान किया जाता है। पूजा प्रायः घर के आँगन या टांड़ में सम्पन्न होती है। सफेद मुर्गे तथा हड़िया का अर्पण किया जाता है। इस पूजा में केवल पुरुष ही भाग लेते हैं। इसका उद्देश्य कृषि-उपज, स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक संतुलन की कामना करना है।
6. देशाउली
यह देव-भूतों की सामूहिक पूजा है, जो लगभग बारह वर्षों में एक बार संपन्न होती है। पूरे गाँव के लोग मिलकर इसमें भाग लेते हैं। ‘भुईंहार’ या ग्राम-प्रधान की देखरेख में विभिन्न पशुओं की बलि दी जाती है— जैसे भैंस, सूअर, बकरा या मुर्गा— जिन्हें विभिन्न देवताओं के नाम पर अर्पित किया जाता है। यह अनुष्ठान ग्राम-सुरक्षा एवं आपदा-निवारण से जुड़ा माना जाता है।
7. पाटो सरना
खड़िया समुदाय का यह प्रमुख पर्व वैशाख मास में मनाया जाता है। इसमें भैंस या बकरा तथा पाँच मुर्गों की बलि विभिन्न देवी-देवताओं के नाम पर दी जाती है। पाहन ‘कालो’ पूजा करते हैं। सरना स्थल पर दूध उबालकर वर्षा की दिशा का अनुमान लगाया जाता है। यह पर्व प्राकृतिक शक्तियों के प्रति आस्था एवं कृषि-निर्भरता का प्रतीक है।
8. सरना पूजा
यह खड़िया समाज की प्रमुख सामुदायिक पूजा है। सरना स्थल पर पाँच मुर्गों की बलि दी जाती है। तीन मिट्टी के पात्रों को उलटकर स्थापित किया जाता है। पके हुए चावल, मांस एवं पुष्प अर्पित किए जाते हैं। यह प्रकृति, ग्राम-देवता और पूर्वजों की आराधना का प्रतीकात्मक अनुष्ठान है।
9. जदकोर पूजा
यह मुण्डा एवं सदान समुदाय का महत्वपूर्ण पर्व है। इसमें पाहन प्रत्येक घर से चावल संग्रह करते हैं। सामूहिक रूप से बलि एवं पूजा-अर्चना कर ग्राम-कल्याण की कामना की जाती है। युवक-युवतियाँ पारंपरिक नृत्य-गीत प्रस्तुत करते हैं और प्रसाद का वितरण किया जाता है।
10. कादलेटा
भाद्रपद मास में मनाया जाने वाला यह पर्व वृक्ष-पूजा से संबंधित है। विश्वास है कि इससे फसल को रोग नहीं लगता। पाहन घर-घर से चावल एकत्र करते हैं तथा जंगल से लकड़ी और डाल लाते हैं। मुर्गे की बलि देकर नए मिट्टी के पात्र में ‘टेहरी’ (चावल-मांस मिश्रित व्यंजन) पकाया जाता है, जिसे पहले देवता को अर्पित किया जाता है।
11. करम पूजा
झारखण्ड का अत्यंत लोकप्रिय एवं व्यापक पर्व है। यह भाई-बहन के स्नेह तथा सामाजिक एकता का प्रतीक है। सात दिन पूर्व बहनें नदी से स्वच्छ बालू लाकर उसमें जौ, गेहूँ, मक्का, उड़द, कुरथी, चना एवं मटर आदि सात प्रकार के अनाज बोती हैं। पूजा के दिन भाई करम वृक्ष की डाल लाकर स्थापित करते हैं। जावा को गीत-गान द्वारा जागृत किया जाता है। करम कथा सुनाई जाती है। जावा को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इसमें गैर-जनजातीय समुदाय भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।
12. सोहराय
यह पशुधन एवं कृषि से संबंधित प्रमुख पर्व है, जो दीपावली के समय, विशेषकर कार्तिक अमावस्या के आसपास मनाया जाता है। गाय-बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर सजाया जाता है। गौशाला में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। कुछ स्थानों पर पारंपरिक बलि-प्रथा भी प्रचलित है। ‘पखवा’ नामक सात अनाजों से बना व्यंजन तैयार किया जाता है। सामूहिक नृत्य-गीत इसका अभिन्न अंग है।
13. देव उठान
कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को देवताओं के जागरण का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल नवमी से देवता निद्रा में रहते हैं और इस दिन जागृत होते हैं। घर की सफाई कर गोबर-लीपन किया जाता है। चावल के घोल से दीवारों पर चित्रांकन किया जाता है। इसके बाद विवाह आदि मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जाती है।
14. जानी शिकार
यह जनजातीय महिलाओं के साहस का प्रतीक पर्व है, जो लगभग बारह वर्षों में एक बार आयोजित होता है। महिलाएँ पारंपरिक पुरुष-वेश धारण कर शिकार के लिए निकलती हैं। सामूहिक आयोजन के पश्चात शिकार का वितरण किया जाता है। यह पर्व स्त्री-शक्ति और सामुदायिक साहस का अनूठा उदाहरण है।
15. सवांन पूजा
सावन शुक्ल सप्तमी को देवी-पूजा के रूप में यह अनुष्ठान होता है। सामूहिक अंशदान से बकरे की बलि दी जाती है। उसका प्रसाद पूरे गाँव में बाँटा जाता है। यह वर्षा ऋतु में देवी-आशीर्वाद की कामना का प्रतीक है।
16. फगुआ
यह जनजातीय पर्व फाल्गुन माह के अंत और चैत्र मास के आगमन के अवसर पर मनाया जाता है। पूर्णिमा की रात गाँव के अखाड़ा में पुआल और लकड़ी इकट्ठा कर अग्नि प्रज्वलित की जाती है। पूरी रात नृत्य-गान और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ उत्सव चलता है। प्रातःकाल किसान अग्नि की राख को शुभ मानकर अपने खेतों में छिड़कते हैं ताकि फसल अच्छी हो। इसके बाद सभी लोग नदी, तालाब या झरने में स्नान कर पूर्वजों को अर्पण करते हैं। घर लौटकर हड़िया का तापन चढ़ाया जाता है तथा मुर्गे की बलि दी जाती है। दिन भर लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और पुराने मनमुटाव भूल जाते हैं। यह झारखण्ड में होली के पारंपरिक रूप के रूप में माना जाता है।17. सरहुल
यह प्रकृति, नवजीवन और वसंत के स्वागत का प्रमुख पर्व है। इसका कोई निश्चित दिन नहीं होता, पर सामान्यतः वैशाख माह के अंतिम दिनों में मनाया जाता है। मुण्डा समाज में इसे ‘बा’ तथा उरांव समाज में ‘खद्दी’ कहा जाता है। खड़िया समुदाय इसे ‘जंकारा सोहराय’ के नाम से भी जानते हैं। साल वृक्ष के फूलों को विशेष महत्व दिया जाता है। गाँव के पाहन सरना स्थल पर पूजा करते हैं और हड़िया का तापन चढ़ाकर मुर्गे की बलि देते हैं। इसके बाद चावल और मांस का प्रसाद सभी में बाँटा जाता है। यह पर्व जनजातीय एकता और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है।18. माघे
इसे जांधा पर्व भी कहा जाता है और मुख्यतः मुण्डा जनजाति द्वारा मनाया जाता है। यह प्रायः माघ मास में आयोजित होता है। इस अवसर पर कृषि मजदूरों से आगामी वर्ष के लिए कार्य करने की सहमति ली जाती है। उन्हें तेल लगाया जाता है और यदि वे अगले वर्ष हल चलाने के लिए तैयार हों तो उन्हें विशेष भोजन और पेय दिया जाता है। यह पर्व कृषि चक्र से जुड़ा हुआ है और आपसी सम्मान को दर्शाता है।19. बोरा बालूंजि
यह चैत्र माह के अंत में मनाया जाता है। इस पर्व में पूरे गाँव की सामूहिक सफाई की जाती है। टूटे-फूटे बर्तन, पुराने औजार और अनुपयोगी वस्तुएँ गाँव की सीमा के बाहर फेंक दी जाती हैं। लोग गाँव से बाहर जाकर सामूहिक रूप से भोजन पकाते और खाते हैं। दूसरे दिन खेतों में बीज बोने की प्रक्रिया प्रारंभ की जाती है। यह पर्व स्वच्छता और नए कृषि सत्र की तैयारी का प्रतीक है।20. हीरो-अंगा
यह बोरा बालूंजि के लगभग एक महीने बाद मनाया जाता है। इसमें देउरी गाँव के देवता को बकरे की बलि अर्पित करता है और फसल की सुरक्षा की प्रार्थना करता है। पूरे गाँव के लोग एकत्र होकर देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।21. रोग खेड़ना
यह पर्व गाँव से बीमारियों को दूर रखने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस अवसर पर पाहन चंदा एकत्र कर तापन अर्पित करते हैं। निर्धारित दिन सभी लोग अपने घर और आँगन की मिट्टी एकत्र कर अखाड़ा में लाते हैं। महिलाएँ उस मिट्टी को गाँव की सीमा के बाहर फेंक देती हैं, जो रोगों को बाहर निकालने का प्रतीक माना जाता है।22. बा पर्व
‘बा’ का अर्थ फूल होता है और यह वसंत ऋतु का पर्व है। इसमें साल वृक्ष के फूलों को विशेष महत्व दिया जाता है। यह तीन दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन घर और आँगन की सफाई तथा रंगाई की जाती है। दूसरे दिन पूर्वजों और देवी-देवताओं के नाम पर भोजन और हड़िया अर्पित किया जाता है। जब तक यह पर्व पूरा न हो, साल फूल को घर में लाना वर्जित माना जाता है।23. अयप्पा पूजा
यह पर्व राँची में निवास करने वाले दक्षिण भारतीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है। यह प्रायः दिसंबर माह में आयोजित होता है। श्रद्धालु भक्ति-भाव से पूजा-अर्चना करते हैं। सामूहिक कार्यक्रम और प्रसाद वितरण इसका मुख्य भाग है।
झारखण्ड के जनजातीय पर्व — शारणी
| क्रम | पर्व का नाम | कब मनाया जाता है | संबंधित समुदाय / विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | बहुरा | भाद्रपद, कृष्ण पक्ष चतुर्थी | महिलाओं का व्रत, संतति कल्याण |
| 2 | भलवा फरेक (भाक कटेका) | कादलेटा के 2–3 दिन बाद | ग्राम-देवता पूजा |
| 3 | चाँद बारेक | भाद्रपद, कृष्ण पक्ष | वृद्ध महिलाओं का उपवास |
| 4 | नवाखानी (तुसगो) | करम के बाद, नई फसल पकने पर | नया अन्न ग्रहण |
| 5 | सुरजाही पूजा | अगहन (मार्गशीर्ष) | सूर्य पूजा |
| 6 | देशाउली | लगभग 12 वर्ष में एक बार | ग्राम-सुरक्षा अनुष्ठान |
| 7 | पाटो सरना | वैशाख | खड़िया समुदाय |
| 8 | सरना पूजा | सामान्यतः वैशाख/वसंत | सामुदायिक प्रकृति पूजा |
| 9 | जदकोर पूजा | क्षेत्रानुसार, प्रायः कृषि काल में | मुण्डा व सदान समुदाय |
| 10 | कादलेटा | भाद्रपद | वृक्ष-पूजा |
| 11 | करम पूजा | भाद्रपद शुक्ल एकादशी के आसपास | भाई-बहन एवं सामुदायिक एकता |
| 12 | सोहराय | कार्तिक अमावस्या (दीपावली समय) | पशुधन पर्व |
| 13 | देव उठान | कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी | मांगलिक कार्य प्रारंभ |
| 14 | जानी शिकार | लगभग 12 वर्ष में एक बार | महिलाओं का साहस पर्व |
| 15 | सवांन पूजा | सावन शुक्ल सप्तमी | देवी पूजा |
| 16 | फगुआ | फाल्गुन पूर्णिमा | होली का पारंपरिक रूप |
| 17 | सरहुल | वैशाख (वसंत ऋतु) | प्रकृति एवं साल फूल पूजा |
| 18 | माघे (जांधा) | माघ मास | मुण्डा समुदाय |
| 19 | बोरा बालूंजि | चैत्र अंत | स्वच्छता व कृषि तैयारी |
| 20 | हीरो-अंगा | बोरा बालूंजि के लगभग 1 माह बाद | फसल सुरक्षा |
| 21 | रोग खेड़ना | निश्चित तिथि नहीं, आवश्यकता अनुसार | रोग निवारण अनुष्ठान |
| 22 | बा पर्व | वसंत ऋतु | साल फूल पर्व |
| 23 | अयप्पा पूजा | दिसंबर | दक्षिण भारतीय समुदाय |
निष्कर्ष
झारखण्ड के ये पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था, प्रकृति-पूजा और सामाजिक एकता के जीवंत प्रतीक हैं। प्रत्येक उत्सव में ग्राम-समुदाय की सहभागिता, पारंपरिक विधि-विधान तथा लोक-विश्वास की स्पष्ट झलक मिलती है। ये परम्पराएँ जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आ रही हैं।