झारखण्ड में सदान
सदानों को झारखण्ड के प्रारम्भिक गैर-जनजातीय स्थायी निवासियों के रूप में माना जाता है। तथापि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रत्येक गैर-जनजातीय व्यक्ति सदान नहीं कहलाता। “सदान” शब्द उन समुदायों के लिए प्रयुक्त होता है जो पीढ़ियों से इस क्षेत्र में स्थायी रूप से निवास करते आए हैं। सदानी परंपरा में पाले गए कबूतर को “सद परेवा” तथा जंगली कबूतर को “बन परेवा” कहा जाता है। यह भाषाई भेद स्थायी निवास और वन-निवास के प्रतीकात्मक अंतर को दर्शाता है। आदिवासी और सदान के बीच मूलभूत अंतर है। आदिवासी जनजातीय समूह हैं जिनकी विशिष्ट जातीय पहचान है, जबकि सदान सामाजिक समुदाय के रूप में संगठित हैं। अतीत में अधिकांश जनजातीय समूह वन-आधारित और आंशिक रूप से घुमंतु जीवन व्यतीत करते थे, जबकि सदानों ने स्थायी ग्राम-आधारित और कृषि-प्रधान समाज का विकास किया।
भाषायी पहचान
सदान समुदाय की पहचान में भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जो गैर-जनजातीय व्यक्ति खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया या कुरमाली भाषा को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलता है, उसे सामान्यतः सदान समुदाय से संबंधित माना जाता है। डॉ. बी. पी. केसरी के अनुसार इन भाषाओं का विकास प्रारंभिक बसने वालों और जनजातीय समूहों के ऐतिहासिक संपर्क से हुआ, विशेषकर नागवंशी परंपरा के प्रभाव में। भाषा की पहचान जातिगत सीमाओं तक सीमित नहीं है। नागदिशुम क्षेत्र में विभिन्न जातियों और भाषाई पृष्ठभूमि के लोग सह-अस्तित्व में रहते थे।
धार्मिक मान्यताएँ
सदानों में हिन्दू धर्म की परंपरा को इस क्षेत्र में प्राचीन माना जाता है। जैन धर्म का भी प्रारंभिक प्रभाव रहा है। इस्लाम का आगमन भारत में छठी शताब्दी के आसपास हुआ और बाद में इसका प्रभाव झारखण्ड क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा। वर्तमान समय में सदान समुदाय के लोग हिन्दू, जैन अथवा मुस्लिम धर्म का पालन कर सकते हैं। केवल धार्मिक पहचान के आधार पर किसी को सदान की श्रेणी से बाहर नहीं किया जाता, यदि उसकी मातृभाषा सदानी समूह की हो। कुछ सदान-प्रधान क्षेत्रों में जैन प्रभाव स्पष्ट है। अनेक सदान वैष्णव परंपरा का अनुसरण करते हैं तथा सूर्य की उपासना करते हैं। संगठित धर्मों के साथ-साथ प्रकृति-पूजा और जीववादी तत्व भी उनके धार्मिक जीवन में दिखाई देते हैं, जो जनजातीय संपर्क का परिणाम हैं।
नस्लीय एवं शारीरिक विशेषताएँ
सदानों को सामान्यतः आर्य मूल का माना जाता है, किन्तु कुछ द्रविड़ समूह भी उनमें सम्मिलित हैं। उनके शारीरिक स्वरूप में विविधता पाई जाती है। रंग गोरा, गेहुँआ या साँवला हो सकता है तथा कद छोटा, मध्यम या लंबा पाया जाता है। यह विविधता आर्य, द्रविड़ और आस्ट्रिक तत्वों के सम्मिश्रण को दर्शाती है।
ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक भूमिका
सदान समुदाय का मुण्डा और उराँव जनजातियों के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। उराँव और मुण्डा समाज की परहा पंचायत प्रणाली में दीवान, ठाकुर, पांडे, करता और लाल जैसे पद महत्वपूर्ण माने जाते थे। मानकी-मुंडा प्रशासनिक व्यवस्था में मुंडा और पाहन जनजातीय प्रमुख होते थे, जबकि लाल, पांडे, ठाकुर और दीवान सहयोगी पदों पर कार्य करते थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि सदान और जनजातीय समुदाय सामाजिक तथा प्रशासनिक स्तर पर परस्पर सहयोगी थे। ब्रिटिश शासन काल में, विशेषकर 1831–32 के कोल विद्रोह के समय, जनजातीय और गैर-जनजातीय समुदायों के बीच भेद अधिक स्पष्ट हुआ। उस काल में “दिकु” शब्द बाहरी व्यक्तियों या शोषकों के लिए प्रयुक्त होता था।
सामाजिक संरचना
सदान समाज पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर आधारित है। परिवार में पिता, माता, बड़े और छोटे भाई, बहनें, चाचा, मामा तथा अन्य रिश्तेदारों का महत्वपूर्ण स्थान है। वंश परंपरा और संपत्ति का उत्तराधिकार सामान्यतः पुरुष रेखा के अनुसार होता है। सांस्कृतिक दृष्टि से सदानों का जीवन-व्यवहार जनजातीय समाज से निकटता रखता है। विवाह संस्कार, पर्व-त्योहार, गीत, नृत्य और भाषा में सांस्कृतिक समन्वय स्पष्ट दिखाई देता है। जनजातीय प्रभाव घरेलू तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भी दृष्टिगोचर होता है, साथ ही आर्य परंपराओं का भी प्रभाव विद्यमान है।
आवास एवं जातीय वितरण
झारखण्ड के विभिन्न भागों में अनेक जातीय समूह निवास करते हैं, जैसे — राजपूत, ब्राह्मण, कुम्हार, सोनार, बनिया, डोम, अहीर, चमार, तेली आदि। नागपुर और आसपास के क्षेत्रों में बाधिक, देशवाली, पैका, धनुक, रावनी, स्वासी, घासी, कानू, लोहार, गड़ारी, तांती और प्रमाणिक जैसे समुदाय भी पाए जाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में इन जातियों का विस्तार उनके ऐतिहासिक प्रवास को इंगित करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में घर प्रायः मिट्टी, बाँस और खपरैल से निर्मित होते थे। घर के भीतर दोनों ओर बर्तनों का सुसज्जित रखा जाना समृद्धि का प्रतीक माना जाता था।
आभूषण
सदान महिलाओं के आभूषणों में पायल, चूड़ियाँ, नथ, कान की बालियाँ, हार तथा शंख-आधारित आभूषण प्रमुख हैं। गोदना की परंपरा भी प्रचलित रही है।
शिकार एवं उपकरण
परंपरागत रूप से धनुष-बाण, भाला, तलवार और कुल्हाड़ी जैसे अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। शिकार की परंपरा जनजातीय समुदायों के समान ही रही। जमींदारी काल में कुछ सदान सैनिक या पहरेदार के रूप में भी कार्यरत थे।
पर्व-त्योहार
सदान समाज में होली, दीपावली, दशहरा, काली पूजा, जितिया, सोहराय, सरहुल, मकर संक्रांति और टुसू जैसे पर्व महत्वपूर्ण हैं। इन उत्सवों में जनजातीय और गैर-जनजातीय सांस्कृतिक तत्वों का समन्वय दिखाई देता है।
नृत्य और संगीत
गाँवों में अखड़ा सामूहिक नृत्य एवं संगीत का केंद्र होता है। युवक-युवतियाँ सामूहिक रूप से पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत करते हैं। डोमकच, झूमर और घोड़ानी प्रमुख नृत्य रूप हैं। विवाह अवसरों पर विशेष सामूहिक नृत्य आयोजित किए जाते हैं। सामूहिक प्रस्तुति को कभी-कभी पुरुष-प्रधान नृत्य परंपरा के रूप में भी संदर्भित किया जाता है। ढोल, मंदर और नगाड़ा प्रमुख वाद्य यंत्र हैं।
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झारखण्ड में सदान
| श्रेणी | मुख्य तथ्य | विशिष्ट विवरण |
|---|---|---|
| पहचान की परिभाषा | सदान का अर्थ | झारखण्ड के मूल गैर-जनजातीय स्थायी निवासी; सभी गैर-जनजातीय व्यक्ति सदान नहीं |
| शब्दार्थ | भाषाई प्रतीक | “सद परेवा” (पालित कबूतर), “बन परेवा” (जंगली कबूतर) – स्थायी निवास का प्रतीक |
| आदिवासी से अंतर | सामाजिक भेद | आदिवासी = जनजाति; सदान = समुदाय; आदिवासी पारंपरिक रूप से गतिशील, सदान स्थायी कृषक |
| भाषाई आधार | सदानी भाषाएँ | खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया, कुरमाली |
| विद्वान संदर्भ | भाषाई मत | डॉ. बी. पी. केसरी – भाषाओं का विकास नागवंशी संपर्क से |
| क्षेत्रीय शब्द | नागदिशुम | बहु-जातीय एवं बहुभाषी सह-अस्तित्व का क्षेत्र |
| धर्म (प्राचीन) | प्रारंभिक धर्म | हिन्दू धर्म प्राचीन माना जाता है |
| जैन प्रभाव | धार्मिक उपस्थिति | सदान क्षेत्रों में जैन धर्म का प्रारंभिक प्रभाव |
| इस्लाम आगमन | ऐतिहासिक प्रसार | छठी शताब्दी में भारत आगमन; बाद में क्षेत्र में प्रसार |
| धार्मिक पहचान नियम | भाषाई शर्त | मुस्लिम/जैन भी सदान हो सकता है यदि मातृभाषा सदानी हो |
| वैष्णव प्रभाव | संप्रदाय | अनेक सदान वैष्णव परंपरा के अनुयायी |
| सूर्य उपासना | धार्मिक प्रथा | सूर्य पूजा का प्रचलन |
| जीववाद प्रभाव | जनजातीय प्रभाव | प्रकृति-पूजा एवं जीववादी तत्व जनजातीय संपर्क से |
| नस्लीय मूल | जातीय पृष्ठभूमि | मुख्यतः आर्य; कुछ द्रविड़ समूह शामिल |
| नस्लीय मिश्रण | मानवशास्त्रीय तत्व | आर्य, द्रविड़, आस्ट्रिक मिश्रण |
| शारीरिक गठन | शारीरिक विशेषताएँ | रंग – गोरा, गेहुँआ, साँवला; कद – छोटा, मध्यम, लंबा |
| प्रशासनिक व्यवस्था | परहा पंचायत पद | दीवान, ठाकुर, पांडे, करता, लाल |
| जनजातीय प्रशासन | मानकी-मुंडा व्यवस्था | मुंडा, पाहन (मुख्य); लाल, पांडे, ठाकुर, दीवान (सहायक) |
| जनजातीय संबंध | सह-अस्तित्व | मुण्डा एवं उराँव समुदाय के साथ निवास |
| ब्रिटिश काल | ऐतिहासिक घटना | 1831–32 का कोल विद्रोह |
| दिकु शब्द | औपनिवेशिक संदर्भ | “दिकु” – बाहरी/शोषक के लिए प्रयुक्त शब्द |
| सामाजिक संरचना | पारिवारिक व्यवस्था | पितृसत्तात्मक समाज |
| पारिवारिक संबंध | रिश्तेदारी | पिता, माता, बड़ा/छोटा भाई, बहन, चाचा, मामा |
| उत्तराधिकार | संपत्ति नियम | पुरुष वंश पर आधारित उत्तराधिकार |
| जातीय वितरण | प्रमुख जातियाँ | राजपूत, ब्राह्मण, कुम्हार, सोनार, बनिया, डोम, अहीर, चमार, तेली |
| क्षेत्रीय जातियाँ | नागपुर एवं आसपास | बाधिक, देशवाली, पैका, धनुक, रावनी, स्वासी, घासी, कानू, लोहार, गड़ारी, तांती, प्रमाणिक |
| प्रवास संकेत | बसावट स्वरूप | विभिन्न क्षेत्रों में जातियों का फैलाव प्रवास को दर्शाता है |
| आवास प्रकार | निर्माण सामग्री | मिट्टी, बाँस, खपरैल |
| समृद्धि प्रतीक | घरेलू प्रथा | घर के भीतर दोनों ओर बर्तनों का रखा जाना समृद्धि का संकेत |
| आभूषण | महिला अलंकरण | पायल, शंख, चूड़ी, नथ, बाली, हार |
| गोदना | सांस्कृतिक प्रथा | महिलाओं में गोदना प्रचलित |
| शिकार उपकरण | पारंपरिक अस्त्र | धनुष, बाण, भाला, तलवार, कुल्हाड़ी |
| जमींदारी भूमिका | व्यवसाय | कुछ सदान सैनिक/पहरेदार रहे |
| पर्व-त्योहार | प्रमुख उत्सव | होली, दीपावली, दशहरा, काली पूजा, जितिया, सोहराय, सरहुल, मकर संक्रांति, टुसू |
| सांस्कृतिक समानता | जनजातीय प्रभाव | विवाह, नृत्य, संगीत परंपराएँ समान |
| अखड़ा व्यवस्था | ग्राम संस्कृति | सामूहिक नृत्य-संगीत स्थल |
| नृत्य रूप | लोकप्रिय नृत्य | डोमकच, झूमर, घोड़ानी |
| नृत्य वर्गीकरण | सामूहिक नृत्य | समूह नृत्य को कभी-कभी “पुरुष नृत्य” कहा जाता है |
| वाद्य यंत्र | पारंपरिक संगीत | ढोल, मंदर, नगाड़ा |